मंगलवार, 31 जनवरी 2023

आज पेड़ों की खुशी

आज पेड़ों की खुशी निराली है
हर तरफ दिख रही हरियाली है
पक्षियों में छाई खुशहाली है
क्योंकि बारिश लाई खुशियों की प्याली है 

Priya kaushik
Hindi Hons 

सोमवार, 30 जनवरी 2023

मेरी जीत होगी......♥️

हां ये हो सकता है कि कोई तुम्हें मुझसे ज्यादा चाहे......

लेकिन जानते हो कोई तुम्हें मेरी तरह चाहे ये ज़रा सा मुश्किल है...... क्योंकि मैंने तुम्हें चाहा वैसे, जैसे तुम चाहे जाना चाहते थे...... मैंने जब तुम्हें चाहा तो कभी कोशिश नहीं की तुम्हारी आदतों को बदलने की...... हमेशा कोशिश की मैंने उन आदतों में ढलने की.....मैने कभी तुम्हारे उसूलों से उलझने की कोशिश नहीं कि.... मैंने कभी कोशिश नहीं की तुम्हें अपने मुताबिक बदलने कि....मैंने कोशिश हमेशा कि तुम्हारे साथ चलने की। हां तुम्हारी खामोशी मुझे चुभती है लेकिन मैंने हमेशा कोशिश की उस खामोशी को समझने कि........

और मुझे कभी इस चीज का मलाल नहीं होगा की कोई तुम्हे मुझसे ज्यादा चाहेगा.....क्योंकि मेरे प्यार की जीत कभी तुम्हे ज्यादा या कम चाहने में नही होगी...... मेरी जीत होगी हमेशा तुम्हे उस तरह चाहने में जिस तरह तुम हो..... सही गलत, अच्छे, बुरे जैसे भी हो बस उसी तरह चाहने में........

~गार्गी
हिंदी ऑनर्स 

रविवार, 29 जनवरी 2023

पिता

आज लेकर कलम अपनी
मैं पिता पर लिखने बैठी
पहली पंक्ति में लिखा मैंने उनकी जिम्मेदारियों को
फिर लिखा मैंने उनकी समझदारियों को
लिखा मैंने उनके अनुभव और उनके ज्ञान को 
लिखा मैंने उनके मान सम्मान को
मैने लिखा तो बहुत कुछ 
मगर एक पिता का मन न लिख पाई
और लिख दिया मैंने शब्दों का एक सागर
फिर भी पिता जैसा एक कण ना लिख पाई।.....
~गार्गी.....

शुक्रवार, 27 जनवरी 2023

भूख

 भूख,

ज्ञान की भूख बना देती है सिद्धार्थ से गौतम बुद्ध जो दुनिया को शांति और सौहार्द सिखाते है बनते है नरेन्द्र से विवेकानंद जो देते है दुनिया को मानवीय मंत्र

भूख,

सत्ता की भूख बना देती है नेता न की राजनेता,जो लूटता है सरेआम देश की अस्मिता जो दिखाता है विकाश और करता है विनाश जो कराता है दंगा करता है समाज को हर दिन नंगा

भूख,

पैसो की भूख बना देती है तैमूर लंग जैसे आक्रमणकर्ता जो लूट लेता है मंदिर और लोगो की आस्था

भूख, 

जिस्म की भूख बना देती है आपको अंधा खुलते है कोठे जहाँ निलाम होती है पूजे जाने वाली अम्मा

भूख, 

अंध धर्म की भूख बना देती आपको आतंकवादी ओसमा बिन लादेन व लश्करे- e- तौबा जो खत्म कर देता है धर्म का मूल सिद्धांत मानवता

भूख,

पेट की भूख बनाती है इसांन को बेबश और लाचार जो बेच डालता है अपना पूरा घर संसार

भूख, 

आत्मसम्मान की भूख बनाती है मनाव से महामानव सधारण से असधारणा जिसमें रच देता है इंसान एक नया इतिहास


तुषिता राज

First year

Hindi hons.

वक्त का पता नही चलता है

 वक्त का पता नही  चलता है

शहर नया लोग नये और नया जीवन


इन दौड़ती भागती सडको पर 

भरे मेट्रो के डिब्बों मे

हम खो गए है या खोज रहे है खुद को, 

पता नही चलता है


कुछ ख्वाबों के लिए इन किताबो

के बोझ तले दबते जा रहे है

या इस दुनिया की अंधी दौड़ मे यू ही चले जा रहे है

कुछ पता नही चलता है


कुछ ख्वाबों के साथ ये शहर चुना था

घर की डाट फटकार से दूर, यहाँ होगा सुकून सुना था


पर क्या सच मे वो ख्वाब पूरे हो रहे है

या बस यूँ ही किताबों का बोझ ढ़ो रहे है


कलेज से हॉस्टल, हॉस्टल से कलेज बस इतने से मे सिमट गयी है जिंदगी


कुछ और भी ख्वाब थे जिन्हे पुरा करने के लिए वक़्त कम पड़ रहा

 हैवक्त का पता नही चल रहा है


आये तो आजादी खोजने थे, बंध गए वक्त की जंजीरों मे


पर घबराना नहीं, क्या पता खुदा ने कुछ अलग कुछ खास लिखा हो तुम्हारी लकीरों मे


बेशक गिरो पर उठो और फिर भागो


क्योंकि सफलता के उस छोर पे भी पीछे गुजरे वक्त का पता नही चलता है


(अनन्या सिंह)

Hindi hons

1st year

शनिवार, 1 जनवरी 2022

लेख - फिल्मों की दुनिया

फिल्मो की हिन्दी

हिन्दी फिल्में देश केफिल्मो की हिन्दी

हिन्दी फिल्में देश के साथ-साथ विदेशों में भी लोकप्रियता प्राप्त कर चुकी हैं। इस प्रकार इन फिल्मों ने देश ही नहीं अपितु विदेशों में भी हिन्दी को प्रोत्साहित किया है।

आज देश में मनोरंजन का सर्वाधिक प्रचलित साधन निःसंदेह भारतीय फिल्में हैं। देश के हर कोने में हिन्दी फिल्म देखी-दिखाई जाती है। अतः हम कह सकते हैं कि हिन्दी फिल्मों ने हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार में काफी योगदान दिया है। 

 

भारत की सर्वप्रथम सवाक फिल्म 'आलमआरा' थी, जिसे सन्‌ 1931 में आर्देशिर ईरानी ने बनाया था। यह फिल्म हिन्दी में बनी थी। कहते गर्व होगा कि प्रथम भारतीय सवाक फिल्म हिन्दी में थी। अब हम यह तो आर्देशिर ईरानी से पूछने से रहे कि उन्होंने अपनी प्रथम फिल्म हिन्दी में क्यों बनाई? अगर यह पूछना संभव भी होता तो ईरानीजी निश्चित रूप से यह कहते कि 'कैसे मूर्ख हो? अरे! हिन्दी तो हिन्दुस्तान की भाषा है। यह तो जन-जन की भाषा है। मुझे अपनी फिल्म देश की 21 करोड़ आबादी तक पहुँचाना है।'

खैर, आज हिन्दी फिल्में जितनी लोकप्रिय हैं शायद ही किसी अन्य भाषा की फिल्में होंगी। विश्व में बनने वाली हर चौथी फिल्म हिन्दी होती है। भारत में निर्मित होने वाली 60 प्रतिशत फिल्में हिन्दी भाषा में बनती हैं और वे ही सबसे अधिक चलन में होती हैं, वे ही सर्वाधिक लोकप्रिय हैं, वे ही सर्वाधिक बिकाऊ हैं।

ऐसा नहीं है कि क्षेत्रीय भाषा की फिल्में चलती ही नहीं हैं। लेकिन असमी फिल्म असम में, तेलुगु फिल्म आंध्र में ही लोकप्रिय होती हैं। इसके विपरीत हिन्दी फिल्म सारे भारत में चलती है। जिस उत्साह से वह उत्तरी भारत में दिखाई जाती है उसी उत्साह से दक्षिण भारत में भी दिखाई जाती है। इसका एक कारण यह भी है कि हिन्दी हमारी संपर्क भाषा है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक हिन्दी लिखने, पढ़ने, बोलने वाले मिल जाएँगे।

इसी प्रकार हिन्दी फिल्मों के दर्शक और प्रशंसक भी आपको पूरे देश में मिल जाएँगे। अनेकता में एकता का जीवंत उदाहरण भारतीय फिल्मोंके अतिरिक्त दूसरा हो ही नहीं सकता। 

 

कुछ सीमा तक दक्षिण में हिन्दी का विरोध है, लेकिन हिन्दी फिल्में लोकप्रिय हैं। खासकर तमिलनाडु में हिन्दी का विरोध किया जाता है, लेकिन इसी तमिलनाडु के तीन शहरों मदुरै, चेन्नाई और कोयंबटूर में हिन्दी फिल्म 'शोले' ने स्वर्ण जयंती मनाई थी! 'शोले' के अलावा 'हम आपके हैं कौन', 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे', 'बॉर्डर', 'दिल तो पागल है' भी पूरे देश में सफल रहीं। 'गदर' और 'लगान' जैसी कितनी ही फिल्में आई हैं जिन्होंने पूरे देश में सफलता के झंडे गाड़ दिए।

हिन्दी फिल्मों में अहिन्दी भाषी कलाकारों के योगदान के कारण भी हिन्दी को अहिन्दी भाषी प्रांतों में हमेशा बढ़ावा मिला है। सुब्बालक्ष्मी, बालसुब्रह्मण्यम, पद्मिनी, वैजयंती माला, रेखा, श्रीदेवी, हेमामालिनी, कमल हासन, चिरंजीवी, ए.आर. रहमान, रजनीकांत आदि प्रमुख सितारे हिन्दी में भी लोकप्रिय हैं। बंगाल की कई हस्तियाँ हिन्दी सिनेमा की महत्वपूर्ण हस्ताक्षर रही हैं।

मसलन मन्ना डे, पंकज मलिक, हेमंत कुमार, सत्यजीत रे (शतरंज के खिलाड़ी), आर.सी. बोराल, बिमल रॉय, शर्मिला टैगोर, उत्त कुमार आदि। प्रसिद्ध अभिनेता डैनी डेंग्जोग्पा अहिन्दी राज्य सिक्किम से हैं, तो हिन्दी फिल्मों के प्रसिद्ध संगीतकार सचिन देवबर्मन तथा राहुल देव बर्मन मणिपुर के राजघराने से संबंधित थे।

इसी प्रकार हिन्दी फिल्मों के लोकप्रिय कलाकार जितेंद्र पंजाबी होने के बावजूद दक्षिण में लोकप्रिय हैं। हिन्दी फिल्मों की प्रसिद्ध हस्तियाँ स्व. पृथ्वीराज कपूर एवं उनका समस्त खानदान, दारासिंह, धर्मेन्द्र आदि पंजाब से हैं। इस प्रकार के और भी कई उदाहरण दिए जा सकते हैं। 

 

हिन्दी फिल्में देश के साथ-साथ विदेशों में भी लोकप्रियता प्राप्त कर चुकी हैं। इस प्रकार इन फिल्मों ने देश ही नहीं अपितु विदेशों में भी हिन्दी को प्रोत्साहित किया है। राजकपूर की 'आवारा' और 'श्री 420' ने रूस में लोकप्रियता के झंडे गाड़ दिए थे। अमिताभ बच्चन, माधुरी दीक्षित, लता मंगेशकर एवं हिन्दी फिल्मों के अन्य कई कलाकार सारी दुनिया के बड़े-बड़े शहरों में अपने रंगमंचीय प्रदर्शन सफलतापूर्वक कर चुके हैं। आज भी ऑल इंडिया रेडियो के उर्दू कार्यक्रमों के फर्माइशकर्ता 90 प्रतिशत पाकिस्तानी श्रोता होते हैं। भारतीय फिल्में और गीत वहाँ सर्वाधिक प्रिय हैं। 

 

सिर्फ भारत के ही कलाकार विदेशों में लोकप्रिय नहीं, बल्कि कई विदेशी कलाकार हिन्दी फिल्मों की वजह से लोकप्रिय हो गए हैं। मेहँदी हसन व गुलाम अली (दोनों पाकिस्तानी गजल गायक) के हिन्दी गीत आज भारत में लोकप्रिय हैं। रूना लैला बांग्लादेश से आकर हिन्दी फिल्मों की वजह से लोकप्रिय बनीं, वहीं पाकिस्तानी अदाकारा जेबा को 'हिना' से लोकप्रियता मिली। इन सब तथ्यों से हम कह सकते हैं कि हिन्दी फिल्मों ने हिन्दी को सौ प्रतिशत प्रोत्साहन दिया है।

 

नंदिनी रॉय 

हिन्दी ऑनर्स

तृतीय वर्ष 

181137

 


शनिवार, 25 दिसंबर 2021

लेख - नई शिक्षा नीति और भारतीय भाषाएं

नई शिक्षा नीति और भारतीय भाषाएं।

शिक्षा किसी समाज और राष्ट्र की जागृति का मूल आधार होती है। अत: शिक्षा का उद्देश्य साक्षरता के साथ-साथ जीवनोपयोगिता भी होना चाहिए। शिक्षा-नीति से अभिप्राय शिक्षा में  सुधारों से होता है। इसका अधिक सम्बन्ध भावी पीढ़ी से होता है। शिक्षा-नीति के द्वारा हम अपने समय के समाज और राष्ट्र की आवश्यकताओं को पूर्ण रूप से सार्थक सिद्ध करने की कोशिश करते हैं। नई शिक्षा-नीति का एक विशेष अर्थ है, जो हमारी सोच-समझ में हर प्रकार से एक नयापन को ही लाने से तात्पर्य प्रकट करती है।

भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम ही नहीं, बल्कि किसी भी राष्ट्र के स्वाभिमान तथा उसकी प्राचीन संस्कृति की संवाहिका भी होती है। गुलाम देशों की अपनी कोई भाषा नहीं होती। वे अपने शासकों की बोली बोलने को मजबूर होते हैं। भाषा के बिना देश गूंगा होता है। कला, संस्कृति, विज्ञान, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, चिकित्सा, विज्ञान, सबका अधिगम भाषा ही है।
विश्व के इतिहास पर दृष्टि डालें तो गुलामी से आजादी के बाद दुनिया के सभी देशों ने अपनी भाषा में अपनी प्रगति का मार्ग चुना। इजराइल ने हिब्रू भाषा को अपनी राष्ट्रभाषा बनाया और आज वह भाषा पूरी दुनिया में तकनीक की प्रमुख भाषाओं में शामिल है। आज हिब्रू का अनुवाद अन्य भाषाओं में लोग करने को मजबूर होते हैं। रूस ने रशियन, चीन ने चीनी और जापान ने जापानी भाषा को अपनी शिक्षा-दीक्षा तथा राजकाज की भाषा बनाया। हमारे छोटे से पड़ोसी देश नेपाल ने भी अपनी भाषा नेपाली ही बनाई।
परंतु भारत में ऐसा नहीं हुआ। दासता से मुक्ति के बाद एक प्राचीन राष्ट्र होते हुए भी अंग्रेजी यहां राजकाज एवं संपर्क की भाषा बनी हुई है। अन्य भारतीय भाषाएं अंग्रेजी की गुलामी करती हुई दिखाई देती हैं। शिक्षा की दशा एवं दिशा सुधारने के लिए अब तक गठित लगभग सभी आयोगों ने अंग्रेजी के वर्चस्व को समाप्त करने की कोशिश की परंतु अंग्रेजों के जाने के बाद भी सिक्का अंग्रेजी का ही कायम है। भारत की स्वतन्त्रता के पश्चात् शिक्षा-सम्बन्धित यहाँ विविध प्रकार के आयोगों और समितियों का गठन हुआ। इस सन्दर्भ में महात्मा गाँधी की ‘बुनियादी शिक्षा’ की दृष्टि बहुत अधिक कारगर और सफल साबित हुई। इसी के अन्तर्गत ‘बेसिक विद्यालयों’ की शुरूआत की गई थी ।

*सन् 1953-54 ई. में भारत सरकार ने शिक्षा-पद्धति पर गम्भीरतापूर्वक विचार करके विशेष प्रकार के आयोग का गठन किया था । इसके अनुसार प्राथमिक (बेसिक) शिक्षा चौथी से बढ़ाकर पाँचवी तक कर दी गयी ।
* इसी तरह सन् 1964, सन् 1966, सन् 1968 सन् 1975 में शिक्षा सम्बन्धी आयोग गठित होते रहे । सन् 1986 में 10+2+3 की शिक्षा-पद्धति शुरू की गई थी ।
नयी शिक्षा-नीति के द्वारा हमारी बुनियादी शिक्षा में परिवर्तन तो हुआ परंतु भारतीय भाषाओं की हिफाजत न हो पाई। पिछले पांच दशकों में देश ने 220 भाषाओं को खो दिया है। यूनेस्को ने 197 भारतीय भाषाओं को लुप्त घोषित कर दिया है। आठवीं अनुसूची की 22 भाषाएं भी कई प्रकार की कठिनाइयों का सामना कर रही हैं। 


राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में बड़ी शिद्दत के साथ इस कमी को महसूस किया गया और पहली बार भाषा की ताकत की पहचान करते हुए हिंदुस्तान को अपनी वाणी दी गई है। इस शिक्षा नीति में पहली बार शिक्षा में हिंदी भाषा तथा अन्य भारतीय भाषाओं में शिक्षण पर पूरा जोर दिया गया। इतना ही नहीं, भाषा को शिक्षा में मूल्य बोध, दृष्टिकोण और सृजनात्मक कल्पना के साधन को भी माना गया है। नई शिक्षा नीति में किशोरावस्था तक मातृभाषा में शिक्षा की व्यवस्था की गई है। इसमें इस बात पर जोर दिया गया है कि मौलिक विचार अपनी मातृभाषा में ही आते हैं, इसलिए उच्च शिक्षा और अनुसंधान के लिए भी मातृभाषा का ही प्रयोग होना चाहिए। विदेशी भाषा सीखने के चक्कर में मौलिक विचार समाप्त हो जाता है। हमारे देश में प्लेटो, अरस्तू, मैक्समूलर आदि तो पढ़ाए जा रहे थे, किंतु भारत के कपिल, गौतम, भास्कराचार्य, चाणक्य, कात्यायन, पतंजलि, सुब्रमण्यम भारती और अगस्त्य जैसे दार्शनिकों, शिक्षाविदों को महत्त्व नहीं दिया गया।

इसी कारण वर्श इस शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं के शिक्षण और अधिगम को स्कूल और उच्चतर शिक्षा के प्रत्येक स्तर के साथ एकीकृत करने की आवश्यकता प्रतिपादित की गई है। नई शिक्षा नीति में सभी भारतीय भाषाओं के संवर्धन को ध्यान में रखते हुए सुझाव दिया गया है कि भाषाओं के शब्द भंडार लगातार अपडेट होते रहें। कविता, उपन्यास, पत्र-पत्रिकाओं का प्रवाह बना रहे भारतीय भाषाओं में चर्चा हो, तभी भाषाओं का संरक्षण हो सकता है। विदेशी भाषा अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन कोरियाई में यह क्रम चल रहा है, किंतु भारतीय भाषाओं को जीवित बनाए रखने के मामले में अभी तक भारत की गति काफी धीमी रही है।

इसके लिए भाषा शिक्षकों की कमी दूर करने के साथ ही भाषाओं को अधिक व्यापक रूप में बातचीत और शिक्षण के लिए प्रयोग में लाए जाने की आवश्यकता है। स्कूली बच्चों के भीतर भाषा, कला और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए उपाय सुझाए गए हैं। इसके लिए मातृभाषा, स्थानीय भाषा में शिक्षण, अधिक अनुभव आधारित भाषा शिक्षण, कलाकारों व लेखकों को स्थानीय विशेषज्ञता के विभिन्न विषयों में विशिष्ट प्रशिक्षक के रूप में स्कूलों से जोड़ने पर बल दिया गया है। उच्चतर शिक्षा संस्थानों में भाषाविदों को अतिथि शिक्षक के रूप में नियुक्त करने, भाषाओं की मजबूती, उपयोग एवं जीवंतता को प्रोत्साहन देने का सुझाव दिया गया है। भारतीय भाषाओं में उच्चतर गुणवत्ता की अधिगम सामग्री उपलब्ध कराने के लिए अनुवाद को बढ़ावा देने पर भी बल दिया गया है। इसके लिए एक "इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रांसलेशन एंड इंटरप्रिटेशन" की स्थापना का भी प्रस्ताव है।

देश की प्राचीन 'संस्कृति' भाषा की प्रगति के लिए इसे मुख्यधारा में लाने हेतु इस भाषा के महत्वपूर्ण योगदान तथा विभिन्न विधाओं एवं विषयों के साहित्यिक, सांस्कृतिक महत्व और वैज्ञानिक प्रगति के चलते इस भाषा को उच्च शिक्षा संस्थानों में ज्ञान-विज्ञान की भाषा के रूप में प्रयोग करने का सुझाव दिया गया है। संस्कृत विश्व की सबसे समृद्ध भाषा है। उसमें शब्द संख्या 10 करोड़ है। अंग्रेजी के मूल शब्द केवल 35 हजार हैं। हिंदी के मूल शब्द नौ लाख हैं। विश्व में हिंदी करीब 85 करोड़ लोगों द्वारा बोली और समझी जाती है, जबकि अंग्रेजी मात्र 32करोड़ लोगों द्वारा बोली और समझी जाती है। संस्कृत के इस महत्व को ध्यान में रखते हुए इस भाषा को पाठशाला एवंविश्वविद्यालयों तक सीमित न रख कर इसे मुख्यधारा में लाने का संकल्प किया गया है।
नई शिक्षा नीति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें कला, संस्कृति और भाषा के माध्यम से मनुष्य की सृजनात्मक क्षमता को जागृत करने पर बल दिया गया है। पहले ज्ञान और कौशल को अलग करके देखा जाता था परंतु उसका यह शिक्षा नीति विरोध करती है। शिक्षा नीति के मसौदे के 22वें स्तंभ में भारतीय भाषाओं, कला और संस्कृति के संवर्धन के संबंध में पूरा खाका पेश किया गया है। इसके अध्ययन से यह साफ हो जाता है कि भारतीयता को आगे रखकर यह शिक्षा नीति बनी है, जिसमें भाषा की शिक्षा पर बल दिया गया है।

धन्यवाद।            
पूजा चौधरी।                                                                  तृतीय वर्ष (3rd year)                                                    हिंदी ऑनर्स (Hindi Honours)        
जीसस एंड मेरी कॉलेज

शनिवार, 11 दिसंबर 2021

कविता - सत्य का उजाला

सत्य का उजाला

राम लला पधारे अयोध्या
सबने लगाया टीका नज़र का काला
चारों ओर था उत्सव का माहौल
कैसा छाया यह सत्य का उजाला

सीता माता और लक्ष्मण भ्राता के संग आए
दूर हुआ अंधकार का जाला
सब थे खुशियां मना रहे
कैसा छाया यह सत्य का उजाला

रावण को मृत्यु तट पर पहुंचा कर
आए मर्यादा पुरुषोत्तम राम निज लाला
राहों में थे हर्ष के दिए सजे
कैसा छाया यह सत्य का उजाला

कहा गया इस शुभ दिन को दीपावली
जहां मुंह में मीठा और घरों में सजी थी फूलों की माला
जलते दियों में थी सच्चाई की जय जयकार 
कैसा छाया यह सत्य का उजाला।


~ अदिति
जीसस एंड मेरी कॉलेज



गुरुवार, 2 दिसंबर 2021

लेख - मैं एक नारीवादी क्यों हूं?

नाम : अदिति

कोर्स : बी ए हिंदी ऑनर्सव

वर्ष : द्वितीय


मैं एक नारीवादी क्यों हूं?



आपने अक्सर यह सुना होगा, देखा होगा, या स्वयं कहा भी होगा कि ' स्त्री और पुरूष में कोई अंतर नहीं होता ' अरे! मगर आपने है तो कहा था कि घर के मर्द ही नौकरी करते हैं औरत नहीं, लड़कियां पढ़ लिख कर क्या करेंगी, बेटी की शादी करना मां बाप का फैसला होगा मगर बेटा अपनी मर्ज़ी से विवाह करने का अधिकार रखता है और हां यह भी कि इज्ज़त औरत का गहना होता है उसे बचा कर रखना चाहिए मगर पुरुष कहीं भी कैसे भी अपनी मर्ज़ी से जीवन व्यतीत कर सकता है। फेमिनिज्म, हिंदी में कहें तो नारीवाद, ऐसे ही विषयों पर विचार विमर्श कर असंख्य प्रयास करता है जिससे आपके ही दिए गए इन कथनों को गलत साबित किया जाए और यह स्पष्ट किया जाए कि हां स्त्री और पुरूष में वाकई कोई अंतर नहीं है।


मैं एक फेमिनिस्ट हूं, एक स्त्री अधिकारवादी। सुनने में कितना अटपटा लगता है ना कि किसीको अपने ही सामान्य अधिकारों के लिए भी संघर्ष करना पड़ सकता है, अचंभित ना हों यहां ऐसा अक्सर होता है। खुद इस समाज का सामना कर जो स्त्री आज उस मुकाम पर है वह जानती है कि एक तुच्च-सी ख्वाहिश पूर्ण करने के लिए भी उसने कभी कितना संघर्ष किया होगा और आज वह भी यही सपना औरों के लिए देखती है कि उस जैसी तमाम स्त्रियों को वह अधिकार मिले, वह मुकाम मिले, वह अवसर मिले जिस कारण समाज में नारी का उद्धार हो।


वह कहते हैं ना कि दुख बांटने से कम होता है मगर जब हम और आप जैसी महिलाएं अपना दुख बाटेंगी तो वह आक्रोश का स्थान लेगा और फिर यही आक्रोश इस समाज में एक बदलाव लाने का कारण बनेगा।



शनिवार, 20 नवंबर 2021

कहानी - रूढ़िबद्धता और सुनीता

कहानी का शीर्षक : रूढ़िबद्धता और सुनीता



उस रोज़ ऑफिस में चहल पहल थी।


कुछ लोगों के काम से प्रसन्न था मोहन तिवारी। मोहन तिवारी ऑफिस का बड़ा अधिकारी था।


कई आदमियों के साथ - साथ एक औरत को भी प्रोमोशन मिलने की खबर तेज़ी से फैल रही थी।


सुनीता, दिमाग से अत्यंत बुद्धिमान महिला। सुनीता को बचपन से काम करने की इच्छा रही थी, वह सोचती थी कि मर्द ही क्यों, औरत नहीं काम कर सकती ? एक सशक्त महिला, जो प्रतिदिन ऐसे वाक्यों से जूझती थी जहां उसे अपनी बुद्धिमानी का परिचय देना पड़ता था क्योंकि औरत तो दिमाग से क्षीण होती है ना।


प्रोमोशन के सिलसिले में सुनीता को मोहन तिवारी अपने केबिन में बुलाता है। वह कुछ खुश नहीं दिखाई दे रहा, शायद उसके मन का द्वंद्व उसके चहरे पर उभरे बिना नहीं रह पा रहा है। वह सुनीता से कहना बहुत कुछ चाहता है मगर शायद कह नहीं पाएगा।


सुनीता : "मे आई कम इन सर?"

मोहन तिवारी : "हां हां सुनीता आओ आओ, बैठो। और बताओ ठीक हो?"

सुनीता : "जी सर, आप कैसे हैं?"

मोहन तिवारी : "बस ठीक ही हैं हम भी, हा हा हा, और बताओ घर में सब कैसे हैं?"


यह सवाल सुनने के पश्चात सुनीता को कुछ खटका।


सुनीता : "बिल्कुल ठीक सर। अच्छा सर आपने केबिन में बुलाया मुझे शायद आप को प्रमोश …"


मोहन तिवारी ने उसकी बात को बीच में ही काट कर कोई और बात रखनी चाही मगर सुनीता सब समझ चुकी थी कि वह उसके प्रोमोशन की बात क्यों नहीं करना चाहते हैं।


सुनीता : "सर, मुझे पता है कि आप मेरे काम से बेहद खुश हैं। आप जानते हैं कि इस ऑफिस में कौन मेहनत से आगे बढ़ना जानता है और कौन केवल अपने लिंग का लाभ उठाकर। मैं जानती हूं आपको कई बातें सुनने को मिली होंगी मगर आप ही देखिए क्या मुझे केवल इस बात पर प्रोमोशन कभी नहीं मिल पाएगा कि मैं एक औरत हूं?"


यह सब बातें सुनकर मोहन तिवारी थोड़ा सपकपा सा रह गया। हां उसके कानों तक बात पहुंची थी कि सुनीता एक औरत है, उसको प्रोमोशन देना यानी प्रतिभाएं नष्ट करना। उसको सुनीता से काफी उम्मीदें थीं, वह जानता है कि सुनीता बिना कोई अन्य रास्ता अपनाए यहां तक पहुंची है मगर लोगों की बातों को भी वह नहीं टाल सकता है। बेशक वह खुद लिंग रूढ़िबद्धता में विश्वास नहीं करता मगर अगर उसे समाज में रहना है तो उसे इसी का पालन करना होगा।


सुनीता के कहे शब्द सुनने के बाद मोहन तिवारी एक गहरी सांस लेकर कहता है - "देखो सुनीता, मैं यह नहीं कह रहा हूं कि तुम इस प्रोमोशन के काबिल नहीं हो, लेकिन अगर मैंने तुमको यह प्रोमोशन दे दी तो लोगों के मन में तुम्हारे ही लिए गलत ख्याल पैदा हो जाएंगे और यहीं नहीं मिलने पर तुम सुरक्षित रहोगी। देखो, सब यही मानते हैं कि आदमी को ही तरक्की मिले क्योंकि वह मेहनत करता है, बुद्धिमान है, अगर एक औरत को तरक्की मिलती है तो यह समाज बिल्कुल इसके विपरीत ही सोचेगा। औरत कमज़ोर होती है, यह नौकरी चाकरी करना उसके बस की बात नहीं होती, ऐसा मैं नहीं समाज सोचता है।


सुनीता यह सब सुनकर थोड़ी अचंभित हुई और उसने तुरंत पूछा : "सर समाज अगर यह मानता है तो आप क्यों इसको बढ़ावा दे रहे हैं, आप तो समझदार व्यक्ति हैं।" जिसके उत्तर में मोहन तिवारी केवल एक वाक्य बोलता है जिससे सुनीता के दिमाग में सब कुछ स्पष्ट हो जाता है।


मोहन तिवारी सुनीता के प्रश्न करने पर कहता है : "समझदार मैं हूं सुनीता मगर हूं तो इसी समाज का हिस्सा ही।


सुनीता उतरा हुआ चेहरा लेकर बिना कुछ कहे मोहन तिवारी के केबिन से बाहर निकलती है। सबकी नजरें उसकी ओर हैं, होनी भी चाहिए, इन्हीं लोगों ने तो प्रोमोशन रुकवाया है सुनीता का मगर हमेशा की तरह सुनीता अब चुप नहीं रहेगी।


वह अपना इस्तीफ़ा दे चुकी है। उसके मन की आवाज़ ने जैसे उसे झंझोड़ कर रख दिया हो कि देख सुनीता समाज में आज भी यह रूढ़ि वादी धारणाएं बनी हुई हैं, इसी को तुझे मिटाना है ताकि कल को कोई औरत यह ना सुने : "माफ़ कीजियेगा, औरतें जितनी भी समझदार हो जाएं मगर समाज मर्दों को ही बुद्धिमान मानेगा और यह बात आप भी मान लीजिए।


- अदिति, जीसस एंड मेरी कॉलेज






रविवार, 14 नवंबर 2021

कविता - दिल से दिल मिलाना

दिल से दिल मिलाना

जश्न भी माना लिया
गले पर फूलों से सजा हार भी डाल दिया
पर क्या इन सबने तुम्हें उस रोती मां का दर्द महसूस करा दिया?

तिरंगे से सजा कफन भी उठा लिया
शान और शौकत से सलाम भी ठोक दिया
पर क्या इन सबने तुम्हें उस सैनिक का दर्द महसूस करा दिया?

यह तो सदियों पुरानी चलती आई कहानियों का ज्ञान है
जो बचपन से ही मन में लड़ाई का एक जुनून सा पैदा कर देती है
पर अनुमान है वहां की सच्ची तस्वीर क्या होती है?

बिना कुछ महसूस किए हम भी उसी गीत में सुर से सुर मिलाते रहे, कि देश के लिए शहीद होना गर्व की बात है।
कभी खुद किसी को शहीद होते हुए देखते
तब भी क्या इस गीत में सुर से सुर मिला पाते?

कभी उनके हालातों में जीवन जीकर देखते
कभी अपनों से सालों जुड़ा होकर देखते
तब भी क्या इस गीत में सुर से सुर मिला पाते?

जिस हार और दहशत को खुद महसूस नहीं किया तो फिर किस मुंह से कह दिया - अपने देश के लिए मर मिट जाना गर्व की बात है।

दोस्तों यह बात गर्व की कम
अपने गिरिबान में झांकने की ज्यादा है
यह बात उन शहीदों और उनके परिवारों की ओर
संवेदना और सहनशीलता जताने की ज़्यादा है।
अपने आने वाली पीढ़ी को सच से परिचित कराने की ज़्यादा है।

अब सुर से सुर मिलाने की नहीं
दिल से दिल मिलाने की कामना है।



दीपशिखा उप्रेती
द्वितीय वर्ष, जीसस एंड मेरी कॉलेज

शनिवार, 6 नवंबर 2021

अनुच्छेद - लॉकडाउन ~ सफल या विफल

लॉकडॉउन- सफल या विफल


"थक कर मत बैठ ए मुसाफिर तू आज हारा है तो कल सफल भी होगा , 

क्या हुआ आज अंधेरा है, तो कल एक नया सवेरा भी होगा"


आज हम सब एक महामारी के दौर से गुजर रहे है। आधुनिकता और विकास के इस दौर में मूल्यों कि चमक कही धुँधली पड़ गई है। चीन से आरंभ हुई इस महामारी ने आज ना ही केवल विकास की दर को जकड़ लिया है किंतु मानवता पर भी एक गहरा संकट बन कर सामने आयी है। ऐसे में विकसित देशों के पास जो संसाधन और जो कुशलता उपलब्ध है, वह विकासशील देशों के पास उस मात्रा मै उपलब्ध नही है जिससे स्थिति और बिगड़ती जा रही है। ऐसा ही विकासशील देश हमारा है जहां इस महामारी का आरंभ फरवरी के पहले हफ्ते में देखने को मिला जिसके बाद से इससे संक्रमित होने वाले लोगों की संख्या बड़ती चली गई। इस वैश्विक महामारी की रोकदम के लिए हमारी सरकार ने "लॉकडाउन" का प्रयोग किया। 


मगर प्रश्न ये उठता है कि क्या यह लॉकडॉउन सफल हो पाया। भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में लोकडाउन का प्रयोग और उसकी सफलता पर कई पक्ष सामने आए। मेरे विचार में जब इस लाकडाउन की उपरी चमक को ना देख कर उसकी गहराई में जाकर देखा जाए तो हमे यह पता चलता है कि यह उपाय सक्षम साबित नहीं हो पाया। कुछ आंकड़े व घटनाओं की सहायता के माध्यम से मैं अपने पक्ष को रखना चाहूंगी।


सर्वप्रथम लॉकडाउन की सूचना देने से उसके आह्वान तक केवल 4 घंटे का समय दिया गया, जब की समय कि मांग यह थी की अग्रिम सूचना दी जाए ताकी देशवासी अपने आप को शारीरिक मानसिक व व्यावसायिक रूप से तैयार कर सकें।


आवश्यकता यह थी कि छोटे उद्योग पति अपने उद्योग व उद्योग में काम कर रहे मजदूरों को पूर्ण तरह सूचित कर व उन्हे कुछ संसाधनों के साथ रवाना कर सके ताकी वह भी महामारी के चलते व काम बंद हो जाने की वजह से अपने घर खर्च और परिवार की देखभाल कर सकें।


"चले थे वो इस आस के साथ की चलते चलते घर पहुंच जाएंगे मगर कहां जानते थे कि

सियासी नीतियों में बंध जाएंगे"

"थी आशा उनके मन में कि गांव पोहोंच जाएंगे मगर कहां जानते थे वो की परिवार को 

रोटी के कुछ टुकड़े और कपड़ों के कुछ पुर्जे ही मिल पाएंगे"


आवश्यकता यह थी कि प्रवासी मजदूरों की आवाज़ भी एक पहचान मांग रही थी। क्या लोगों इन हालातों में उन मज़दूरों को दो वक्त की रोटी मिल पाई? 


आवश्यक्ता यह थी कि कोटा में फंसे छात्रों की गुहार भी सुनी जाती। आवश्यकता यह थी कि जो छात्र अपनी प्रवेश परीक्षाओं की अनबन में फंसे है उन्हे सरकार की तरफ से एक मर्गदृष्टी मिलती जिससे वह छात्र मानसिक दबाव में आकर आत्महत्या का माध्यम नही चुनते।


तालाबंदी के मध्य वेतन का भुगतान, व बहू राष्ट्रीय संगठहनों द्वारा कर्मचारियों को निलंबित करना इन विषयों को भी संबोधन की आवश्यकता थी| प्रश्न यह है कि इसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा? 

 

"मुरझाए फुलवारी के लिए वो शीतल पवन थे निराशा में वो आशा की किरण थे

सैकड़ों चिराग जलाए उन्होने

 रहे कार्यरत वह तन मन से"


कोरोना काल में कार्यरत सुदृढ़ व निष्ठापूर्वक "कोरोना वॉरियर" के अगर कार्य स्थलों व सुविधाओं  को हम देखें तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं कि किन स्थितियों और हालतों में कोरोना वॉरियर काम कर रहे हैं।


जमीनी हकीकत देखी जाए तो पता लगता है कि चिकित्सक, पुलिसमैन, बैंक कर्मी व अध्यापक जो इस काल में भी शिक्षा संस्थानों में आकर ऑनलाइन संसाधनों के माध्यम से छात्रों को शिक्षित कर रहे है, क्या उन्हे पूर्ण सुरक्षा मिल रही है? 


क्या सरकार ने चिकित्सक, बैंक कर्मी व पुलिस कर्मियों को उचित संख्या में "PPE" किट पहुंचाई? वेतन व अच्छी सुविधाओं के बिना भी वह अपनी कुशलता के माध्यम से पूर्ण निष्ठा के साथ इस महामारी से संक्रमित लोगो का इलाज कर रहे हैं। शायद ही बहुत कम लोग इस बात से परिचित हैं कि कई चिक्तिसक 5 महीनों से अपने घर नहीं गए। 


आवश्यकता यह हैं की इस जंग में जिन चिकत्सकों ने अपनी जान गंवाई है उनकी शहादत को व्यर्थ ना जाने दिया जाए, ना की सिर्फ थाली पीट कर झूठा सम्मान दिखाया जाए।


सबसे महत्वपूर्ण विषय जो लॉकडाउन से प्रभावित हुआ है वह है देश की "जीडीपी", प्रश्न यह उठता है कि क्या लॉकडॉउन के चलते अपनी नौकरी खोने वाले कर्मचारियों व अपना उद्योग बंद पड़ते देखने वाले छोटे  उद्योग पति, बिना वेतन के बिना काम कर रहे चिकित्सा कर्मी, सफाई कर्मी व शिक्षकों की जिम्मेदारी कौन लेगा। 


 कुप्रबंधन व अदूरदर्शी योजना ही सबसे बड़ा कारण है की लॉकडाउन असफल रहा।


अंत में बस यही कहना चाहती हूं कि कोई राष्ट्रीय सम्पूर्णत: किसी महामारी के लिए तैयार नहीं होता ना ही यह भविष्यवाणी कर सकता है की क्या होने वाला है पर उस समस्या से लड़ने के लिए आवश्यकता है कि एक प्रबंधित, व्यवस्थित व दूरदर्शित योजना का पालन हो और राष्ट्रवासियों का इस लड़ाई में पूर्ण सहयोग या योगदान हो।


धन्यवाद

पुनर्नवा शर्मा

(Psychology (hons) 3rd year) 



शनिवार, 30 अक्टूबर 2021

अनुच्छेद - मिथिला की संस्कृति

*मिथिला की संस्कृति*


भारत के विभिन्न क्षेत्र में भिन्न भिन्न संस्कृति और परंपरा की छटा दिखती है मिथिला की संस्कृति उत्तर भारत की एक विशिष्ट संस्कृति के रुप में जानी जाती है।

मिथिला में हर जाति , धर्म , वर्ग , समुदाय के लोग रहते है, पर सबके बीच सौहार्द और स्नेह का अटूट संबंध है। राजा जनक और उनकी सुपुत्री जानकी इस क्षेत्र की विशिष्टता के प्रतीक हैं यहां के निवासी सरल और शांतिप्रिय हैं। मिथिलांचल क्षेत्र में मुख्यत: मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर, जयनगर, एवं सीतामढ़ी जिले आते हैं मिथिला का मुख्य केंद्र दरभंगा है , जिसे भावी मिथिलांचल की राजधानी भी कहा जाता है। यहां की मुख्य भाषा मैथिली है , जो कर्णप्रिय एवं मधुर है। मछली पान और मखाना यहां की संस्कृति के प्रमुख अंग है यहां शुभ अवसरों पर इनके प्रयोग की सुदीघ पंरपरा रही हैं।
यहां आज भी ग्राम्य संस्कृति की झलक देखी जा सकती है अब भी यहा धोती कुर्ता और साड़ियों को पहनावे के रुप में देखा जा सकता हैं।

यहां धार्मिक सद्भाव का अनुपम रुप लक्षित होता है हर धर्म के लोग मिल कर सभी त्योहारों को मनाते हैं  यह क्षेत्र त्याग, दर्शन , नीति , और सदाचार के लिए प्रसिद्ध रहता है।

यहां की चित्रकला *मिथिला पेंटिंग* के नाम से विश्व विख्यात है यहां के कलाकार केवल देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी सम्मान प्राप्त कर चूके है इसी पावन धरती पर विद्यापति, आयाची मिश्र, नागार्जुन , मंडन मिश्र, चंदा झा एवं दरभंगा महाराज जैसे महापुरुषों ने जन्म लिया, जिनके यश सौरभ से आज भी यहा का वातावरण सुगंधित है । साहित्य , कला एवं संस्कृति की दृष्टि से मिथिला संस्कृति भारत की संस्कृतियों में विशिष्ट स्थान रखती है इस कारण कहा गया है की मिथिला संस्कृति में संपूर्ण भारतीय संस्कृति का प्रतिबिंब झलकता हैं।


सच कहे तो मैथिल, मिथिला और मैथिली अतिविशिष्ट है 
प्रतिभा, मिलनसारिता , नम्रता व आचरण की शुद्धता का संगम है मिथिला।

विद्या , तप , त्याग, दही, मछली, पान और मखाना की अनमोल भूमि है मिथिला । विश्व की समस्त भाषाओं का मिठास की दृष्टि से , भूषण है मैथिली।

" स्वर्ग से सुंदर मिथिला धाम,
मांदान आयाची राजा जनक के गाम,
स्वर्ग से सुंदर मिथिला धाम"


*अंकिता आनंद*
*हिंदी ऑनर्स , द्वितीय वर्ष*

शनिवार, 23 अक्टूबर 2021

अनुच्छेद - सर्वव्यापी महामारी/संगरोध

सर्वव्यापी महामारी /संगरोध (pandemic/quarantine)

दुनिया चुप हो गई है जबकि यह चिल्ला रही है और अंदर से उखड़ रही है। यह एक स्तरित चुप्पी है और मैं इस चुप्पी को पसंद करना शुरू कर सकती हूं और शायद कर रहीं हूं। 
          जो कुछ भी चल रहा है, अब पहले से कहीं ज्यादा, अपने आप को पहले रखें और वास्तव में क्या मायने रखता है, इसके लिए समय बनाएं। आपको एहसास होगा कि वास्तव में क्या महत्वपूर्ण है। इस महामारी में बस सिर पर छत हो, दिन के माध्यम से पर्याप्त भोजन और पानी और किसी से बात करने के लिए हो बस इतना ही काफी है। हमारे पास अब जो नही है वो है देर रात की पार्टियां, महंगे डिनर, छुट्टी और भौतिकवादी चीजें जो सिर्फ दूसरों को दिखाने के लिए होती है। जीवन के अर्थ में वास्तविक मूल्य को जोड़ना नहीं, लोगों के साथ समान होना, उन लोगों के साथ होना जिन्हें आप प्यार करते हैं, केवल वही बात महत्वपूर्ण है। अपने आप को प्यार, सहानुभूति, क्षमा और दया के साथ समृद्ध करें। अपने स्थान को एक खुश और सकारात्मक बनाएं। अपने आप को अपना # 1 व्यक्ति बनाएं क्योंकि अब हमारे आस-पास केवल एक चीज है और वो है लॉकडाउन , और जो एकमात्र निरंतर मैं देख रही हूं वह हम खुद है। हम सीखेंगे और बहुत कुछ महसूस भी करेंगे क्योंकि यह समय ही ऐसा  है। हमें अपने आप पर जीत, अपनी चिंता पर जीत करनी है क्योंकि अंत में यह केवल एक चरण है, जिसने हमें अपने लिए समय दिया। इस महामारी को देखते हुए एक कविता प्रस्तुत कर रही हूं- 

आज बड़े दिन बाद हवा से मिली :-

आज बड़े दिन बाद मैं हवा से मिली
पूछा मैंने "कहा चली ?"
बोली " चली जा रही हूं मैं अकेले गली- गली, कोई साथ खेलने वाला ही नहीं! "
"किसकी पत्ते की प्लेट उड़ायू, किसकी बालों को सहलाऊ??" 
हंसते हुए बोला मैंने "तो बैठो मेरे साथ करो दो-चार बात" 
तो बोली "आजकल क्या दिन और क्या रात, हर समय बस यही एक बात ' करो सैनिटाइजेशन ' और धोलो अपने हाथ" 
सुनकर मैं बोली "क्या बात- क्या बात! "
                   तनु श्री रावत
                 (B.A hons Hindi)

सोमवार, 18 अक्टूबर 2021

Article On Hindi

Article on Hindi

जैसे अन्य विषय,हिन्दी भी हमे नई चीज़ो के बारे मे जानने के लिए समझने का एक बड़ा दायरा प्रदान करता है और हमे पता चलता है कि वे एक दूसरे के साथ कैसे जुड़े हुए है| यह ज्ञान की एक धारा है| हर कविता और कहानी से एक नैतिक मूल्य हम सबको प्राप्त होती है जो हमें सीखने को मिलता है जो कि बहुत दिलचस्प है और संचार रणनीति मे भी मदद करता हैं| यह विषय जीवन में अर्थ जाड़ने वाली हर छोटी सी छोटी चीज़ को समझने में भी मदद करता है और हमें मामले के महत्व का पता चलता हैं| यह विषय जीवन में रंग भर देता है चाहे वह कितना भी नीरस क्यों न हों| इस विषय मे मैने जो भी कवि पढ़े है, उनसे मैने मानवता सीखी हैं| जिस तरह उनमें से प्रत्येक ने इस फार्म की समझ को उजागर किया, मैं उसकी सराहना करती हूँ| धर्म के कारण लोगो के बीच में युद्ध वर्षो से विवाद है लेकिन कवियों ने लड़ने के बजाय एक साथ रहने के लिए बहुत समर्थन किया| वे प्यार फैलाते है नफरत नहीं| इससे मुझे व्यक्तिगत रूप से बहुत कुछ सिखने को मिला क्योंकि आज के समकालीन संसार में ईर्ष्या, स्वार्थ और घृणा है| और जीवन में इन अवांछित चीज़ों से बचने के लिए पक्षपात को रोक कर प्यार, स्नेह और दोस्ती फैलना ही एक महत्वपूर्ण चीज़ है| मैंने यह भी सीखा है की ख़ुशी- ख़ुशी रहना और एक दूसरे का सहयोग करना अच्छी बात है और हम सभी को यह ज्ञान सबके साथ बाँटना चाहिए| हिंदी से हमारे अंदर भावनात्मक विकास होता है| विचारों में बड़ी ताकत होती है और विचार हमें भावनात्मक रूप से मज़बूत बनाते है| और मुझे यह लगता हैं की जो भावनात्मक रूप से मज़बूत हो उसे इस दुनिया में कोई नहीं हरा सकता| क्योंकि जो टूट कर भी मुस्कुरा दे, उसे कोई नहीं हरा सकता| मुझे यह लगता है की हम जैसा पढ़ते है और जैसे माहौल में रहते है, हमारी सोच भी वैसी हो जाती है और इंसान अपनी मेहनत से ज़्यदा अपनी सोच से ही बनता है, क्योंकि वह जिस स्तर की सोचता है वह फिर उसी स्तर की मेहनत भी करता है| तो मैंने यह भी सीखा है की हम जो भी सोचते है, वैसा ही करते हैं, और वैसा ही बनते हैं| 'हिंदी' विश्व में बोली जाने वाली प्रमुख भाषाओं में से एक है| विश्व की प्राचीन, समृद्ध और सरल भाषा होने के साथ -साथ हिंदी हमारी राष्ट्र भाषा भी है| यह भाषा अनादि काल से प्रयोग की जाती रही है और ये लोगो के बीच संचार का एक सशत्क माध्यम रही है| एक भाषा के रूप में हिंदी बातचीत को समझने का एक आसान तरीका प्रदान करती हैं, जिसे सबसे महत्वपूर्ण उपकरण माना जाता है| हिंदी जीवन में अहम भूमिका निभाती है| हममें से बहुत से लोग अन्य भाषाओं के बारे में नहीं जानते होंगे लेकिन हर कोई हिंदी भाषा के बारे में जानते हैं, भले ही वे लिख नहीं सकते, लेकिन बोल और समझ सकते हैं| जिससे संचार आसान हो जाता है| यह एक बेहतर समझ प्रदान करता है| हिंदी से हमें मानवीय मूल्य सीखने को मिलते हैं, क्योंकि सबसे से पहले साहित्य और कविता की बात करें तो, वह एक ऐैसे परिस्थितियों को बताता हैं जिनसे वह गुज़र रहा है और समाज को भी दर्शाता है क्योंकि वह एक हिस्सा है| मेरा दृढ़ विश्वास है की हिंदी साहित्य के माध्यम से किसी अन्य मनुष्य या व्यक्ति के जीवन का ज्ञान और समझ संभव है, क्योंकि कविता और कहानी का उदाहरण लेने पर हम उसमें अपना प्रतिबिंब और भावनाएँ देख सकते हैं| चुंकि हम देख सकते हैं कि कोई व्यक्ति कविता या कहानी में क्या कहना चाह रहा है इसलिए हमें मानव मानस की समझ मिलती है| भारतीय साहित्यक परम्परा विश्व में सबसे पुरानी है| यह मुख्य रूप से पछ में से एक है और अनिवार्य रूप से मौखिक है| जीवन के आयामो विभिन्न पहलुओं को हिंदी साहित्य के माध्यम से गहराई से समझा जा सकता है क्योंकि यह पूरी मानवता का प्रतिबिंब है,जो आदिकाल से शुरू होता है, जहां एक राजा कि जीत का जश्न मनाया जाता था और इस युग मे प्रकाश डाला जाता था जो उस समय को दर्शाता है जब युध्द हुआ करते थे और युध्द जीतना अत्याधिक महत्वपूर्ण होता था। इसलिए यह मानव जीवन के गौरव पहलू को दर्शाता है। रीतिकाल युग जीवन के प्रेम और सौंदर्य पहलू को चित्रित करता है| यहाँ के राजा विभिन्न कवियों और नर्तकियों को अपने दरबार में मनोरंजन के लिए बुलाते थे| यहाँ बिहारी लाल, धनानंद जैसे कवियों ने अपनी कविताओं में जीवन के प्रेम पहलू को दर्शाया है, जो एक व्यक्ति के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है| धनानंद ने व्यक्तिगत जीवन में एक तरफ़ा प्रेम पहलु को चित्रित किया है| बिहारी लाल ने प्रेम पहलु को चित्रित करने के लिए भगवान कृष्ण और राधा के सन्दर्भ का प्रयोग किया| भक्तिकाल, इस अवधि में जीवन के धार्मिक पहलू को चित्रित किया गया है| कबीरदास और मीराबाई की कविताओं में एक भक्त के मन और भक्ति का चित्रण किया गया है| कवितायेँ दिखाती है की कैसे एक भक्त का मन भगवान के प्रेम से रंग जाता है| आधुनिक काल, इस समयावधि विकसित में ये स्वयं को मुक्त करने और एक मज़बूत मानसिकता विकसित करने के संघर्ष की शुरुआत थी| इसमें पूर्व स्वतंत्रता, मध्य स्वतंत्रता और स्वतंत्रता के बाद का समय शामिल है|  यह समय अवधि जीवन के स्वतंत्रता के पहलु के लिए एक व्यक्ति की इच्छा को दर्शाती  है| इस समय के दौरान प्रिंट मीडिया का विकास हुआ और यह लोगों के लिए अपनी राय रखने और समाचारों और वर्त्तमानो घटनाओं से अवगत होने का एक माध्यम था| यह जीवन के आत्म जागरूकता पहलुओं को भी दर्शाता है|
 
                                                                      -Meggeeny N. Simte     
B.A. Programme(pol.Science and socio)
                                   
 
 



कविता - सुधर जा ऐ मानुष

           सुधर जा ऐ मानुष

सुधर जा ऐ मानुष अब भी समय है,
सुधर जा ऐ मानुष अब भी समय है॥
यह लीला रची है जिसने संसार की
आज देखा है उसने यह कुकर्म का लेखा
देखा उसने अभी बस कुछ क्षण भर है, ध्यान देने पे प्रलय न आने में देर है
सुधर जा ऐ मानुष अब भी समय है।।
यह सुनामी,यह त्रासदी,यह बदलती महामारी यह सब तेरे कर्मों का फल है।।
सुधर जा ऐ मानुष अब भी समय है,
जो बीत गया सो भूल कर कल को उजियार, वरना यह कमाई धरी रह जायेगी सब तेरे जाने के बाद,,कुछ ना रहेगा तब तेरे चाहने वालो के पास,खुद के लिए कम जरूरत मंद लोगों के लिए कर विचार।
क्या करेगा यूं घूम कर दूर विदेशी राज्य
जब न रहेगा खुद का यह स्वर्गीय सा कुटुम्ब राज्य।।
सुधर जा और कर सब पर उपकार
भूल जा द्वेष भावना अपना मैत्री की राह
भूल जा किसे देना है दंड किसे करना है क्षमा।।
रख बस ईश्वर पर भरोसा यह पल भी बदलेगा जरूर अगर सब मिल कर देगे एक दूसरे का साथ।।
होगा अगर सब उसके अनुसार,सब ठीक हो जायेगा रख उस पर विश्वास।।।


_वर्षा द्विवेदी_


बुधवार, 6 अक्टूबर 2021

नाटक - बेबाक बैठक

बेबाक बैठक

यह जंगल जात दुनिया है, इंसानी दुनिया से अलग थलग दोनो दुनिया के कानून है, अपनी रियावते हैं । एक इमरजेंसी  आ जाने पर, सभा की बैठक बुलाई जाती है । सभा के 6 प्रमुख सदस्य है- शेर, हाथी, बंदर , चीटी, गीदड, गिद्ध । इस सभा की अध्यक्षा है - चींटी । और शयाम का समय होने के करण कक्ष मैं अंधेरा काफ़ी है।
गीदड- अध्यक्ष साहिबा शुरु कीजिए ।
गिद्ध- जी, फरमाइय , क्यों सभी को इख्टठा किया है।
चींटी- इस सभा की अध्यक्ष होने के नाते, आने के लिए आप सभी का धन्यवाद करती हूँ और___
गीदड- (बीच के टोकटते हुए) शेर दादा कहाँ है? आए नहीं क्या अभी तक?
बंदर- दो मिनट चुप ( डाटते हुए) ।
बोलिए अध्यक्षा साहिबा।
चींटी - जी, धन्यवाद बंदर जी। शेर दादा थोडी देरी से आएँगे । कल रात की घटना से आप सभी परिचित होंगें।
हाथी- जी हाँ। ( सिर हिलाते हुए)
गिद्ध- कौनसी घटना ?
गीदड- ( मजाकिया व्यवहार से) सुना है आप आसमान में रहते है, फिर भी न्ही मालूम । हा हा हा
गिद्ध- (गुस्से से) जी ठीक सुना है आपने, लेकिन हर वक़्त आसमान मैं नहीं टंगा रहता । ( कहते - 2  रुक जाता है)
गीदड - अरे माफ कीजिए भाई, आप बुरा मान गए ।
चींटी- (चश्मा साफ करते हुए) क्या यह बैठक मजाक करने के  लिए बुलाई गई हैं?
गीदड - माफ कीजिए, माफ कीजिए।
( अभी भी हँसता हैं।)
चींटी- मुद्दे पर आते है, कल रात को , सभी जानवरों की सोता पाकर कुछ इंसान हमारी सीमा मै घुस आए थे। शेर दादा ने उन्हें देख लिया बंदी बना लिया।
गिद्ध- संख्या में कितने थे?
गीदड़- दो ( सोचते हुए)।
चींटी- उनसे पुछ - ताछ की जा रही है, अभी तक बात साफ तोर पर बाहर नहीं आई है।
बंदर - हाँ, लेकिन इतनी परेशानी की बात क्या है , इंसान पहले घूंसे थे। हमशा ही घूंसे चले आते हैं ।
बंदर- हाँ, इंसान जात सुधरेंगी थोड़ी । आए होंगे जंगलो पर कब्जा करने।
गिद्ध- या हमारे भाई - बँधुओ का शिकार करने।
चींटी- शुरु-शुरु में जाच कर्तओ को यहीं लगता था । लेकिन धीरे धीरे आभास हुआ, मामला यह नहीं है । चारो इंसान बहुत डरे हुए हालत मै पकड़े गए थे ।
( कमरे का गेट खुलता है, शेर दादा का प्रवेश होता है। चेहरे से चिंता टप टप टपकती नज़र आती है।)
गीदड़- गुड़  मॉर्निंग, शेर दादा।
शेर दादा- गुड़ इवनिंग , शुक्रिया सभी बैठ जाईए ।
गिद्ध- ( बंदर से कहते हुए ) इस गीदड़, कम बुद्धि को सभा का सदस्य बनाया किसने ।
बंदर- हा,हा,हा___।
हाथी - शेर दादा, क्या मालूम चला?
गीदड़- हाथी साहब हब आप बोले, हमे तोह लगा आज की भी टॉक टाईम बचा लेंगे आप। हा,हा,हा___।
[सभी गीदड़ को घुरते है, चींटी अध्यक्षा उसे चुप रहने का इशारा करते है।]

शेर दादा- पुछ ताछ में उन्होनें बताया है की वो चारों हमें एक अहम सूचना गुप्त ढंग से देने आ रहे थे, दुसरे इंसानो ने उन्हें देखा तोह भागने लगे और हमें पकड़े गए ।
बंदर- सफ़ेद झूठ ।
चींटी- अगर उन्हें हमसे बातचीत करनी थी तो समझौता कानून के मुताबिक उन्हें अपनी सरकारी कमेटी को हमारे पास सूचना देने भेजना चाहिए था।
गिद्ध- मुझे भी येही लगता है यह स्वंम को बचाने के लिए यह बाहना बना रहे है ।
शेर दादा- लेकिन सोचने वाली बात है, अगर उनका कोई दुसरा बुरा इरादा होता तो उनके पास से हमें बंदूक या दुसरे हथियार मिलते ।

बंदर (हैरानी से)- क्या सच में उनके पास कोई हथियार नहीं थे।
शेर दादा- नहीं, लाठी तक नहीं ।
( सब हैरानी से सोचने पर मजबूर हो जाते है)
हाथी _ तोह क्या उन्होने बताया क्या सूचना देना चाहते थे ?
शेर दादा- हाँ, बताया लेकिन बात की गंभीरता को समझने के लिए मै चाहता हूँ आप खुद उनसे सुने ।
चींटी अध्यक्षा के कहने पर चार कुर्सियाँ और लगवाई जाती है, शेर दादा के कहने पर अपना परिचय देते है।
इंसान 1- मैं ह्यूमन लैंड डिपार्टमेंट का एक कलेर्क हूँ , बंदर भाई के जो दाई ओर बैठा है वो मेरा साला है ( इंसान 2) पेशे कुछ नहीं हैं बेरोजगार हैं। सोशलिय साइंस करता है, इसलिए साथ - साथ चला आया ।
इंसान 3 (महिला) - मैं भी वही से ही हूँ, उनकी वकील हूँ ।
इंसान 4- मैं जो, ह्यूमन डिपार्टमेंट, के बगल मै जो इंसानी मंत्रयालय है न, हम वहाँ चपरासी हूँ ।
शेर दादा- ठीक है जो तुमने मुझे बताया वो इन सबको बताओ।
इंसान 1- कल दोपहर इंसानी मंत्रालय  के सदन मै चल रही चर्चा समाप्त हो गई । इंसानो ने मनुष्यता को दुनिया भर मैं समाप्त कर दिया, अब वह काफ़ी महिनों से खाली बैठे है, तो उन्होनें अपने मनोरंजन के लिये एक योजना तैयार की है, की क्यों ना अब जानवरों की दूनिया को खत्म करा जायेजाये

चींटी- (चौकते हुए) क्या मतलब ?
इंसान 1- उनके प्क़स बोहुत शक्तिशाली हथियार , मजहब कम, जाति तोप, वर्ग भेद RDx लिंग भेद मशीन गन। यही वो यहाँ लाना चाहते है ।
इंसान 3 - वह प्रत्यक्ष रूप से आप पर हमला नहीं कर सकते क्योकी आप लोगो की संख्या हम से बहुत अधिक है। 
( सदन मे सभी सदस्य बौखला उठते है, ऐसी बात सुनकर सभी के होश घूम जाते है)
चींटी- हम हम हम तुम्हारी सरकार से बात करेंगे।
इंसान 4 - सरकार ही तो चालक है साहिबा।
(सदन मे फिर से कोलाहल मच जाता है, किसी का चेहरा गुस्से से लाल, किसी का दर के ढक जाता है।)


शांत  हो जाईये । कृपा कर सभी शांत हो जाईए। मसले का हल निकालने की कोशिश कीजिए , हंगामा मत मचाईए ।

गीदड़- हल नहीं, हमला करना है।
चींटी, गिद्ध,शेर,हाथी- नहीं, बिल्कुल नहीं । (चिल्लाते हुए)
गीदड़- आप सभी अपने सिद्धांतों की चांदी चमकाए हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहिए, और वो आकर हमारी दुनिया में गन्दगी फैलाकर नष्ट कर देंगे , तब जाकर गिनाते रहना जनता को अपने को अपने सिद्धांतो का ताना-बाना ।
बंदर- तुम बोलने से पहले सोचा करो वरना चुप रहा करो । (डाटते  हुए )

गीदड़- चुप तो तुम रहो, तुम्हारी ही जात का विकास है यह नीच आदम कह। सबका लटने छीनने की आदत है इनकी, और बदनाम है गीदड़ |

(सब बंदर की तरफ देखने लगते हैं)

बंदर- हाँ भाई, हमारी ही जात का विकास हैं, घृणा इसी बात को सोच- सोच कर आती है। अगर यह डार्विन (Darwin ) बता कर नहीं  गया होता तो आज हम इस कलंक से मुक्त होते । (शर्मिंदा होते हुए )

चींटी- गीदड़, आपके इस व्यवहार के लिए सभा से आपको बाहर निकाला जा सकता है। अगली बार चेतावनी नहीं की जाएगी।

(सभा में चारों और सन्नाटा छा गया । शेर दादा इंसान-1 इशारा कर आगे की योजना बताने को कहते है।)

इंसान 1-उनका सबसे पहला हथियार है-मजहब जैन, बौद्ध, हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई ___का नाम सुना है?

हाथी- नहीं।

इंसान 1- हाँ मैं जानता हूँ ।

यह मजहब है। यानि अलग-अलग धर्म है। हर धर्म के लोग जैसे पण्डित, मौलवी, पादरी आदि आकर आपकी अपने धर्म की अचाईया और दूसरे धर्म की बुराइयों बतायेंगे फिर एक धर्म चुनने को कहेंगे, जो धर्म आपने चुना वही धर्म आपके आने वाली पीढ़ी के साथ सदियों- द-सदियों जुड़ा रहेगा।

चींटी- लेकिन हम कोई धरम नहीं चुनना चाहे तो?
इंसान 1- न चुनने का तो कोई ऑप्शन ही नहीं है। अथिएस्ट बनने वालों को सीधा गोली जारी जाएगी।
गिद्ध- पर मजहब तो यह सब नहीं हैं ।
इंसान 1- हाँ वैसे है तो नहीं थे,

लेकिन हम इंसान है, हम अपने हिसाब से मजहब को अपने हिसाब से तोडते मोडते हैं और फिर अपने कर्मों को मजहब का नाम देते हैं। यह इंसानों का मैन हथियार है, इसके बाद और भी है...

एक के बाद दूसरा इस्तेमाल किया जाता है। मजहब बम के बाद 'जाति तोप' ।

गिद्ध- वो क्या है?

इंसान 2- जाति मतलब दबाना ।
गिद्ध- वो क्या है?
इंसान 2 - धर्म चुनने के बाद बात खत्म नहीं होती।
हाथी- जरा समझना ।

इंसान 1 - हर धर्म में जातियाँ है, हर धर्म बटा हुआ है।मुस्लिम मै जैसे शेख,   खान, क़ुरेशी। हिंदू में ब्राहमण,क्षत्रिय,वैश्य,शूद्र , कैथोलिक, प्रोतेस्तंत इसाईयों में, बहुत जातियाँ है भाई।
हाँ लेकिन जातियों को धर्म के अनुसार चुनना होगा।

हाथी- इसको चुनने से क्या होगा?

इंसान 1- जीवन जीने के लिए केवल रोटी, कपड़ा, मकान थोड़ी चाहिए होता है, पावर भी तो चाहिए। ('दबाने की पावर (Power)। जो ऊँच जाति में जाएगा उसके पास शक्ति होती।

हाथी- कैसी शक्ति?

इंसान- नीची जाति को दबाने की शक्ति आप जन्मजात धर्म से जुड़े नहीं है इसलिए धर्म के साथ जाति भी चुनने की आजादी लेगी। हम इंसानो के पास चुनने का मौका नहीं था पर आप के पास होगा, मेरा तो सुझाव है ऊंची जाति चुनिएगा । भवनाओं और भाइचारे में बहकर नीची जाति न चुन लिजीएगा  |

गीदड़- तो क्या सभी को जाति चुनने का मौका दिया जाएगा ।

इंसान 1- हाँ ।
गीदड़- ऐसे सब ऊंची जाति ही चुनेगे। (सोचता है)
इंसान - नहीं- नहीं ।

गीदड़- तो फिर।
इंसान 1- इस समस्या के निवारण के लिए तीसरे प्रयोग किया जाएगा ।

बंदर- तीसरा हथियार (आँखें बड़ी करता है ) 
इंसान- RDx , वर्गभेद RDक्ष का इस्तेमाल किया जाएगा ।
गीदड़- वर्गभेद मतलब क्या?
इंसान 1 - मतलब अमीर - गरीब । आपकी दुनिया में भी तो ये होते होंगे।

चींटी- तो बस जो अमीर है वो ऊँचे, जो गरीब है वो नीचे। जो आपके घरों में दफ्तरों (offices) में काम करते आए हैं, उन्ही को धकेल दीजिए। उन्हें कुछ आपत्ति भी नहीं होगी, उनकी पीढ़ी  -दर- पीढ़ी यह काम करती रहेगी, जब तक उन्हे गलत का आभास होगा, सदिया बीत चुकी होगी आपकी जिंदगी मौज मैं गुजरे__।

गीदड़- (अपनी बंद मुट्ठी को खोलते हुए गुस्से से बीच में चिल्लाता है) बंद करो यह जाहिलीयत (गीदड की अआ आवाज मैं शेर की दहाड़ जैसा खौफ था)
बंदर- चिल्ला क्योँ रहें हैं, ऐसा सचमुच मै होगा नहीं ____

गीदड़- कैसे नहीं होगा, जिस तरह ये तुम्हारे लिए नीच आयम जात से भाई बन गए, उसी तरह यह भी होने मैं देर नहीं ।
चींटी- तुम बेकार में बौखला रहे हो।
गीदड़- बेकार, बेकार, नहीं बिल्कुल नहीं, आप सभी को चिंता न्ही क्योकी आप सभी अमीर है । गरीब तोह हम है न, न पक्का घर, न रोज़गार । लेकिन गरीब है तो अपने लिए नहीं ।( ताना देते हुए ) शेरबाबा तो राजा है, चींटी साहिबा बड़े पार्टी की नेता है, जंगल पर आपकी ही पार्टी का राज है। हमारे बंदर साहिब तो इंसानो के भाई है। गिद्ध जी, पूरे आसमान का सरोकार संभालते है।

गिद्ध- (चिल्लाते हुए) अपनी सीमा मत लँगो ।
गीदड़- क्यों , क्योँ  न लाँगू  (गुस्से से)

हाथी- (विनम्रता से) गीदड़ भाई, विनति है गुस्सा मत किजीए। बैठ जाइए।

गीदड़- नहीं भाई, वहाँ ऐसी सोच पनपे, वहाँ में सांस न लूँ, तुम बैठने की बात करते हो।

(दरबाजे को जोर से पटकते हुए कक्ष से बाहर चला जाता है, एक बार फिर सदन में घोर सन्नाटा छा गया। हर कोई एक दूसरे का मुंह देखने लगता है । पूरे वार्तालाप के दौरान शेरदादा का मूक रहना, सभी के मस्तिष्क पर प्रश्नचिन्ह लगाता देता है। )

(शेरदादा इंसान 1 को बात जारी रखने का आदेश देते है)

इंसान- जी_जी_आगे

(गीदड़ की ललकारती अवाल से वो दहल गया है उसके मुँह से आवाज़ नहीं निकलती,इंसान 3 आगे की बात करने के लिए शेरदादा से इशारे से अनुमति माँगती है, चींटी सब देखती है, और इंसान 3 की घुघरे हूए कहती है सभा की अध्यक्षा में हूँ )

इंसान 3 - जी

चींटी- बात जारी रखिए।

इंसान - वर्गीय RDx  के बाद, लिंग भेद की चलाई जाएगी।

बंदर - (सुस्ती से) अब यह क्या है।

इंसान 3- पुरुष जात स्वयं को सर्वश्रेष्ठ और बेहतर बताने के लिए सदैव एक उदाहरण रखता है - नारी। 
गिद्ध- साफ-साफ बताइए बहंजी ।

इंसान - सभी जीव यो में विभाजित है - नर और माया | जिस तरह ऊँची जाति, निम्न जाति को दबाने की ताकत रखता है, उसी तरह नर जात, नारी जात को दबाने की शक्ति रखता है। जब लिंग भेद मशीन गन चलाई जाएगी। सबको उनकी डयूटी (Duty) याद दिलाई जाएगी
चींटी-  कैसी Duty ?

इंसान 3- नर की ड्यूटी है- माया को कब्जे में रखना, स्वयं को सर्वश्रेष्ठ बनाए रखना |

चींटी - और माया की कैसी Duty?

इंसान 3- प्रजनन की Duty, घर का काम करने की Duty, अपने प्रमेश्वर की अराधना की Duty, खूब सारा दहेज लाकर ससुराल में नाम करने की Duty, पति, साँस, ससुर, नंद, भोजाई सबसे मार खाने की Duty, फिर स्वंय को फांसी लगने की Duty, आदि आदि आदि । बहुत लंबी List है।

इंसान 4 - माया जात का काम घर में रहता है, बस्ता बस्ता लटकाना नहीं, (यह उन इंसानों का कहना है अध्यक्षा साहिब)

( काली चींटी का मुख गुस्से से लाल हो जाता है।)

बंदर - मतलब चींटी साहिबा हमारी अध्यक्ष नहीं रहेगी। 
चींटी- (खूब तेज चिहलाती हूए) चुप रहो तुम।

आज की सभा को यहीं रोकने का आदेश देता हूँ, कल दुबारा 5 बजे शाम में बैठक बुलाई जाएगी । 

शेर दादा- (ऐतराज दिखाते हुए) यहाँ हम सभी समय निकालकर आए है। अब आप जब बोलेंगी तभी सभा समाप्त होगी - शाम 7 बजे या मुद्दा समाप्त होने पर।
चींटी- (गुस्से से) अच्छा!
( चींटी को नज़रो में शेर दादा के लिए जो सम्मान था वो चंद पलो में घृणा में बदल गई ।
बाकी बंदर, गिद्ध दोनो शेर दादा की हाँ में हाँ मिलाते है।

चींटी- ठीक है, तो अब आप सभी समस्या के लिए सुझाव प्रस्तुत करे।

बंदर-(इंसान से पूछते हुए) अगर हम इस योजना को हमारी दुनिया पर लगाने से कर दे तो? 

गिद्ध _ तो वो युद्ध करने पर उतारू  हो जाएँगी । 

बंदर- तो हम भी युद्ध कर लेंगे।

इंसान- और घर जाएंगे। 
बंदर-  क्यों-क्यों घरेंगे।

इंसान 3- भूलिए मत वो इंसान है, शेर दादा जैसे ताकतवर जानवर भी उनके चिड़िया घर में सौ पीस (show piece) बना रखा है, उनके पास सेना है, Nuclear power है। अपने घर बैठे -बैठे आपकी दुनिया को नष्ट कर सकते है। वो तो उनका दिल बड़ा है कि ऐसा कुछ किया नहीं अभी तक।सोचिए जरा, जंग करने जायेंगे तो जान से जायेंगे। न घर बचेगा, न परिवार सब राख बन हवा में उड़ जाएगा ।
इंसान 3- और आखिर बुराई न्या है ऐसे जीने में। आप लोगों की दुनिया तो अव्यवस्थित है। इस योजना के आने से व्यवस्थित हो जाएगी।

चींटी- वो लिंग भेद मशीन गन वाली बात___

इंसान 3- अरे! आप उसकी चिंता कर रहीं है क्या? बिल्कुल चिंता न कीजिए, आप तो हमारी अपनी है, आपका इंतजाम हो जाएगा ।

चींटी- अच्छा (गहरी सांस लेते हुए) तो क्या हल यहीं है कि उनकी योजना मान ली जाए ।

इंसान - हाँ, अगर बिना युद्ध बीना हानि-नुक्सान प्रस्ताव स्वीकार कर लिखा जाए तो।

अध्यक्ष साहिब, आप सभी एक कागज़ पर अपनी सहमति से हस्ताक्षर कर, सरकारी को हर लगाकर हमें दे दीजिए , हम वो कागज़, इंसानी मंत्रालय तक आपकी तरफ से पहुँचा देगे।
( सभी हाँ- हाँ करते है ।)
( चींटी एक कोरा कागज़ निकालकर अपनी सहमति लिखती है, शेर दादा, गिद्ध-बंदर भी उसपर हस्ताक्षर कर देते हैं, सरकारी मोहर लगाकर कागज़ इंसान-3 को दिया जाता है। यह देखकर चारों इंसान अपनी ढोंग/ नाटक की सफलता पर मुस्कुराते हैं।

निघत शिरीन
बी. एल. एड
Ex student जीसस एंड मेरी कॉलेज, हिंदी विशेष

रविवार, 26 सितंबर 2021

कविता : दो टूक जवाब

कविता : दो टूक जवा

मैं पूछ रही थी श्रीमान
क्या है मजहब क्या है इंसान?
क्या दोनों से है अस्तित्व की पहचान?

कौन मिटा रहा है किसका निशान?
किसने रोकी है किसकी उड़ान?
मजहब है या है वह इंसान?

एकदम से चीख पड़ा मजहब विद्वान
बोला, क्यों घसीट रही हो मुझे बेईमान?
खुद ही लगाई जा रही हो सब अनुमान
हमने नहीं बांटा इंसान
इंसान ने हमें बांटा शैतान
हम तो वहां भी हैं जहां हैं सब सुनसान

घरों में तो ये बैठे हैं आलीशान
नीच कर्मों के हैं यह धनवान
नैतिकता की पोटली बनाए रखी है मूल्यवान

सच इन्हें लगता है अपमान 
सब ने ओढ़ी है झूठी मुस्कान
करते हैं खुद पर शत-प्रतिशत अभिमान
स्वयं को समझते हैं बहुत बड़ा शक्तिमान
यही तो तोड़ना चाहते हैं हिंदुस्तान
सत्य तो यह है आप भी नहीं हैं इन बातों से अनजान।


निघत शिरीन
जीसस एंड मेरी कॉलेज एलुमनी 2020
बीए हिंदी ऑनर्स

रविवार, 12 सितंबर 2021

कविता : आज़ादी का उत्सव

नाम : तेजस्वी
कोर्स : बी ए हिंदी ऑनर्स
वर्ष : तृतीय
कॉलेज : जीसस एंड मेरी कॉलेज

कविता : आज़ादी का उत्सव

बात उस दौर की है जब भारत एक गुलाम था,
हम पर हुकूमत था करता, वह ब्रिटेनी ताज था।
जुल्म का स्तर कुछ इस प्रकार था की भरी दोपहरी में अंधकार था,
हर पल मन एक ही ख्याल सताता, कि अब अगला कौन शिकार था।
किंतु फिर भी मन में विश्वास था, क्योंकि कलम का ताकत पास था,
जो मौखिक शब्द ना कर पाते, ऐसे में यह एक शांत हथियार था।
आक्रोश की ज्वाला धधक रही थी, आंदोलन बनके वह दमक रही थी,
स्वतंत्रता की बात क्या उठी, चिंगारी शोले बन चमक रही थी।
लिख लिख कर हमने भी गाथा, दिलों में शोलों को भड़काया था,
सत्य अहिंसा को हथियार बनाकर, अंग्रेजों को बाहर का मार्ग दिखाया था,
बहुत मिन्नतों बाद दिखा हमें, आज़ादी का यह उत्सव था।

कविता - आज़ादी का अमृत महोत्सव

नाम : अदिति
कोर्स : बी ए हिंदी ऑनर्स
वर्ष : तृतीय
कॉलेज : जीसस एंड मेरी कॉलेज

कविता - आज़ादी का अमृत महोत्सव

आओ चलो याद करें उन वीर जवानों को,
जिन्होंने अपने लहू बहाया इस देश को बचाने को

सलाम करती हूं मैं मेरे उन भाइयों को,
जो तैनात खड़े हैं मेरे देश की हिफाज़त को।

लाल किले पर प्रधानमंत्री खड़े हैं झंडा फहराने को,
'सेवा परमो धर्म:' कह रहे हैं मेरे देश को जगाने को।

ना जाने कितने सिपाहियों ने जान गवायीं इस देश को बचाने को,
ताकि हम आगे चलते चलें इस देश को ऊंचा उठाने को।

जो उन्होंने सोचा था उस सपने को साकार करने को,
हमारे युवा बढ़े हैं आगे हर मुकाम हासिल करने को।

वादा करते हैं आंच नहीं आने देंगे इस देश की मिट्टी को,
इसी मिट्टी की सौगंध खाकर जीते हैं उनके सपनों को सच करने को।

आज पेड़ों की खुशी

आज पेड़ों की खुशी निराली है हर तरफ दिख रही हरियाली है पक्षियों में छाई खुशहाली है क्योंकि बारिश लाई खुशियों की प्याली है  Priya kaushik Hind...