शनिवार, 25 दिसंबर 2021

लेख - नई शिक्षा नीति और भारतीय भाषाएं

नई शिक्षा नीति और भारतीय भाषाएं।

शिक्षा किसी समाज और राष्ट्र की जागृति का मूल आधार होती है। अत: शिक्षा का उद्देश्य साक्षरता के साथ-साथ जीवनोपयोगिता भी होना चाहिए। शिक्षा-नीति से अभिप्राय शिक्षा में  सुधारों से होता है। इसका अधिक सम्बन्ध भावी पीढ़ी से होता है। शिक्षा-नीति के द्वारा हम अपने समय के समाज और राष्ट्र की आवश्यकताओं को पूर्ण रूप से सार्थक सिद्ध करने की कोशिश करते हैं। नई शिक्षा-नीति का एक विशेष अर्थ है, जो हमारी सोच-समझ में हर प्रकार से एक नयापन को ही लाने से तात्पर्य प्रकट करती है।

भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम ही नहीं, बल्कि किसी भी राष्ट्र के स्वाभिमान तथा उसकी प्राचीन संस्कृति की संवाहिका भी होती है। गुलाम देशों की अपनी कोई भाषा नहीं होती। वे अपने शासकों की बोली बोलने को मजबूर होते हैं। भाषा के बिना देश गूंगा होता है। कला, संस्कृति, विज्ञान, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, चिकित्सा, विज्ञान, सबका अधिगम भाषा ही है।
विश्व के इतिहास पर दृष्टि डालें तो गुलामी से आजादी के बाद दुनिया के सभी देशों ने अपनी भाषा में अपनी प्रगति का मार्ग चुना। इजराइल ने हिब्रू भाषा को अपनी राष्ट्रभाषा बनाया और आज वह भाषा पूरी दुनिया में तकनीक की प्रमुख भाषाओं में शामिल है। आज हिब्रू का अनुवाद अन्य भाषाओं में लोग करने को मजबूर होते हैं। रूस ने रशियन, चीन ने चीनी और जापान ने जापानी भाषा को अपनी शिक्षा-दीक्षा तथा राजकाज की भाषा बनाया। हमारे छोटे से पड़ोसी देश नेपाल ने भी अपनी भाषा नेपाली ही बनाई।
परंतु भारत में ऐसा नहीं हुआ। दासता से मुक्ति के बाद एक प्राचीन राष्ट्र होते हुए भी अंग्रेजी यहां राजकाज एवं संपर्क की भाषा बनी हुई है। अन्य भारतीय भाषाएं अंग्रेजी की गुलामी करती हुई दिखाई देती हैं। शिक्षा की दशा एवं दिशा सुधारने के लिए अब तक गठित लगभग सभी आयोगों ने अंग्रेजी के वर्चस्व को समाप्त करने की कोशिश की परंतु अंग्रेजों के जाने के बाद भी सिक्का अंग्रेजी का ही कायम है। भारत की स्वतन्त्रता के पश्चात् शिक्षा-सम्बन्धित यहाँ विविध प्रकार के आयोगों और समितियों का गठन हुआ। इस सन्दर्भ में महात्मा गाँधी की ‘बुनियादी शिक्षा’ की दृष्टि बहुत अधिक कारगर और सफल साबित हुई। इसी के अन्तर्गत ‘बेसिक विद्यालयों’ की शुरूआत की गई थी ।

*सन् 1953-54 ई. में भारत सरकार ने शिक्षा-पद्धति पर गम्भीरतापूर्वक विचार करके विशेष प्रकार के आयोग का गठन किया था । इसके अनुसार प्राथमिक (बेसिक) शिक्षा चौथी से बढ़ाकर पाँचवी तक कर दी गयी ।
* इसी तरह सन् 1964, सन् 1966, सन् 1968 सन् 1975 में शिक्षा सम्बन्धी आयोग गठित होते रहे । सन् 1986 में 10+2+3 की शिक्षा-पद्धति शुरू की गई थी ।
नयी शिक्षा-नीति के द्वारा हमारी बुनियादी शिक्षा में परिवर्तन तो हुआ परंतु भारतीय भाषाओं की हिफाजत न हो पाई। पिछले पांच दशकों में देश ने 220 भाषाओं को खो दिया है। यूनेस्को ने 197 भारतीय भाषाओं को लुप्त घोषित कर दिया है। आठवीं अनुसूची की 22 भाषाएं भी कई प्रकार की कठिनाइयों का सामना कर रही हैं। 


राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में बड़ी शिद्दत के साथ इस कमी को महसूस किया गया और पहली बार भाषा की ताकत की पहचान करते हुए हिंदुस्तान को अपनी वाणी दी गई है। इस शिक्षा नीति में पहली बार शिक्षा में हिंदी भाषा तथा अन्य भारतीय भाषाओं में शिक्षण पर पूरा जोर दिया गया। इतना ही नहीं, भाषा को शिक्षा में मूल्य बोध, दृष्टिकोण और सृजनात्मक कल्पना के साधन को भी माना गया है। नई शिक्षा नीति में किशोरावस्था तक मातृभाषा में शिक्षा की व्यवस्था की गई है। इसमें इस बात पर जोर दिया गया है कि मौलिक विचार अपनी मातृभाषा में ही आते हैं, इसलिए उच्च शिक्षा और अनुसंधान के लिए भी मातृभाषा का ही प्रयोग होना चाहिए। विदेशी भाषा सीखने के चक्कर में मौलिक विचार समाप्त हो जाता है। हमारे देश में प्लेटो, अरस्तू, मैक्समूलर आदि तो पढ़ाए जा रहे थे, किंतु भारत के कपिल, गौतम, भास्कराचार्य, चाणक्य, कात्यायन, पतंजलि, सुब्रमण्यम भारती और अगस्त्य जैसे दार्शनिकों, शिक्षाविदों को महत्त्व नहीं दिया गया।

इसी कारण वर्श इस शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं के शिक्षण और अधिगम को स्कूल और उच्चतर शिक्षा के प्रत्येक स्तर के साथ एकीकृत करने की आवश्यकता प्रतिपादित की गई है। नई शिक्षा नीति में सभी भारतीय भाषाओं के संवर्धन को ध्यान में रखते हुए सुझाव दिया गया है कि भाषाओं के शब्द भंडार लगातार अपडेट होते रहें। कविता, उपन्यास, पत्र-पत्रिकाओं का प्रवाह बना रहे भारतीय भाषाओं में चर्चा हो, तभी भाषाओं का संरक्षण हो सकता है। विदेशी भाषा अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन कोरियाई में यह क्रम चल रहा है, किंतु भारतीय भाषाओं को जीवित बनाए रखने के मामले में अभी तक भारत की गति काफी धीमी रही है।

इसके लिए भाषा शिक्षकों की कमी दूर करने के साथ ही भाषाओं को अधिक व्यापक रूप में बातचीत और शिक्षण के लिए प्रयोग में लाए जाने की आवश्यकता है। स्कूली बच्चों के भीतर भाषा, कला और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए उपाय सुझाए गए हैं। इसके लिए मातृभाषा, स्थानीय भाषा में शिक्षण, अधिक अनुभव आधारित भाषा शिक्षण, कलाकारों व लेखकों को स्थानीय विशेषज्ञता के विभिन्न विषयों में विशिष्ट प्रशिक्षक के रूप में स्कूलों से जोड़ने पर बल दिया गया है। उच्चतर शिक्षा संस्थानों में भाषाविदों को अतिथि शिक्षक के रूप में नियुक्त करने, भाषाओं की मजबूती, उपयोग एवं जीवंतता को प्रोत्साहन देने का सुझाव दिया गया है। भारतीय भाषाओं में उच्चतर गुणवत्ता की अधिगम सामग्री उपलब्ध कराने के लिए अनुवाद को बढ़ावा देने पर भी बल दिया गया है। इसके लिए एक "इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रांसलेशन एंड इंटरप्रिटेशन" की स्थापना का भी प्रस्ताव है।

देश की प्राचीन 'संस्कृति' भाषा की प्रगति के लिए इसे मुख्यधारा में लाने हेतु इस भाषा के महत्वपूर्ण योगदान तथा विभिन्न विधाओं एवं विषयों के साहित्यिक, सांस्कृतिक महत्व और वैज्ञानिक प्रगति के चलते इस भाषा को उच्च शिक्षा संस्थानों में ज्ञान-विज्ञान की भाषा के रूप में प्रयोग करने का सुझाव दिया गया है। संस्कृत विश्व की सबसे समृद्ध भाषा है। उसमें शब्द संख्या 10 करोड़ है। अंग्रेजी के मूल शब्द केवल 35 हजार हैं। हिंदी के मूल शब्द नौ लाख हैं। विश्व में हिंदी करीब 85 करोड़ लोगों द्वारा बोली और समझी जाती है, जबकि अंग्रेजी मात्र 32करोड़ लोगों द्वारा बोली और समझी जाती है। संस्कृत के इस महत्व को ध्यान में रखते हुए इस भाषा को पाठशाला एवंविश्वविद्यालयों तक सीमित न रख कर इसे मुख्यधारा में लाने का संकल्प किया गया है।
नई शिक्षा नीति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें कला, संस्कृति और भाषा के माध्यम से मनुष्य की सृजनात्मक क्षमता को जागृत करने पर बल दिया गया है। पहले ज्ञान और कौशल को अलग करके देखा जाता था परंतु उसका यह शिक्षा नीति विरोध करती है। शिक्षा नीति के मसौदे के 22वें स्तंभ में भारतीय भाषाओं, कला और संस्कृति के संवर्धन के संबंध में पूरा खाका पेश किया गया है। इसके अध्ययन से यह साफ हो जाता है कि भारतीयता को आगे रखकर यह शिक्षा नीति बनी है, जिसमें भाषा की शिक्षा पर बल दिया गया है।

धन्यवाद।            
पूजा चौधरी।                                                                  तृतीय वर्ष (3rd year)                                                    हिंदी ऑनर्स (Hindi Honours)        
जीसस एंड मेरी कॉलेज

शनिवार, 11 दिसंबर 2021

कविता - सत्य का उजाला

सत्य का उजाला

राम लला पधारे अयोध्या
सबने लगाया टीका नज़र का काला
चारों ओर था उत्सव का माहौल
कैसा छाया यह सत्य का उजाला

सीता माता और लक्ष्मण भ्राता के संग आए
दूर हुआ अंधकार का जाला
सब थे खुशियां मना रहे
कैसा छाया यह सत्य का उजाला

रावण को मृत्यु तट पर पहुंचा कर
आए मर्यादा पुरुषोत्तम राम निज लाला
राहों में थे हर्ष के दिए सजे
कैसा छाया यह सत्य का उजाला

कहा गया इस शुभ दिन को दीपावली
जहां मुंह में मीठा और घरों में सजी थी फूलों की माला
जलते दियों में थी सच्चाई की जय जयकार 
कैसा छाया यह सत्य का उजाला।


~ अदिति
जीसस एंड मेरी कॉलेज



गुरुवार, 2 दिसंबर 2021

लेख - मैं एक नारीवादी क्यों हूं?

नाम : अदिति

कोर्स : बी ए हिंदी ऑनर्सव

वर्ष : द्वितीय


मैं एक नारीवादी क्यों हूं?



आपने अक्सर यह सुना होगा, देखा होगा, या स्वयं कहा भी होगा कि ' स्त्री और पुरूष में कोई अंतर नहीं होता ' अरे! मगर आपने है तो कहा था कि घर के मर्द ही नौकरी करते हैं औरत नहीं, लड़कियां पढ़ लिख कर क्या करेंगी, बेटी की शादी करना मां बाप का फैसला होगा मगर बेटा अपनी मर्ज़ी से विवाह करने का अधिकार रखता है और हां यह भी कि इज्ज़त औरत का गहना होता है उसे बचा कर रखना चाहिए मगर पुरुष कहीं भी कैसे भी अपनी मर्ज़ी से जीवन व्यतीत कर सकता है। फेमिनिज्म, हिंदी में कहें तो नारीवाद, ऐसे ही विषयों पर विचार विमर्श कर असंख्य प्रयास करता है जिससे आपके ही दिए गए इन कथनों को गलत साबित किया जाए और यह स्पष्ट किया जाए कि हां स्त्री और पुरूष में वाकई कोई अंतर नहीं है।


मैं एक फेमिनिस्ट हूं, एक स्त्री अधिकारवादी। सुनने में कितना अटपटा लगता है ना कि किसीको अपने ही सामान्य अधिकारों के लिए भी संघर्ष करना पड़ सकता है, अचंभित ना हों यहां ऐसा अक्सर होता है। खुद इस समाज का सामना कर जो स्त्री आज उस मुकाम पर है वह जानती है कि एक तुच्च-सी ख्वाहिश पूर्ण करने के लिए भी उसने कभी कितना संघर्ष किया होगा और आज वह भी यही सपना औरों के लिए देखती है कि उस जैसी तमाम स्त्रियों को वह अधिकार मिले, वह मुकाम मिले, वह अवसर मिले जिस कारण समाज में नारी का उद्धार हो।


वह कहते हैं ना कि दुख बांटने से कम होता है मगर जब हम और आप जैसी महिलाएं अपना दुख बाटेंगी तो वह आक्रोश का स्थान लेगा और फिर यही आक्रोश इस समाज में एक बदलाव लाने का कारण बनेगा।



शनिवार, 20 नवंबर 2021

कहानी - रूढ़िबद्धता और सुनीता

कहानी का शीर्षक : रूढ़िबद्धता और सुनीता



उस रोज़ ऑफिस में चहल पहल थी।


कुछ लोगों के काम से प्रसन्न था मोहन तिवारी। मोहन तिवारी ऑफिस का बड़ा अधिकारी था।


कई आदमियों के साथ - साथ एक औरत को भी प्रोमोशन मिलने की खबर तेज़ी से फैल रही थी।


सुनीता, दिमाग से अत्यंत बुद्धिमान महिला। सुनीता को बचपन से काम करने की इच्छा रही थी, वह सोचती थी कि मर्द ही क्यों, औरत नहीं काम कर सकती ? एक सशक्त महिला, जो प्रतिदिन ऐसे वाक्यों से जूझती थी जहां उसे अपनी बुद्धिमानी का परिचय देना पड़ता था क्योंकि औरत तो दिमाग से क्षीण होती है ना।


प्रोमोशन के सिलसिले में सुनीता को मोहन तिवारी अपने केबिन में बुलाता है। वह कुछ खुश नहीं दिखाई दे रहा, शायद उसके मन का द्वंद्व उसके चहरे पर उभरे बिना नहीं रह पा रहा है। वह सुनीता से कहना बहुत कुछ चाहता है मगर शायद कह नहीं पाएगा।


सुनीता : "मे आई कम इन सर?"

मोहन तिवारी : "हां हां सुनीता आओ आओ, बैठो। और बताओ ठीक हो?"

सुनीता : "जी सर, आप कैसे हैं?"

मोहन तिवारी : "बस ठीक ही हैं हम भी, हा हा हा, और बताओ घर में सब कैसे हैं?"


यह सवाल सुनने के पश्चात सुनीता को कुछ खटका।


सुनीता : "बिल्कुल ठीक सर। अच्छा सर आपने केबिन में बुलाया मुझे शायद आप को प्रमोश …"


मोहन तिवारी ने उसकी बात को बीच में ही काट कर कोई और बात रखनी चाही मगर सुनीता सब समझ चुकी थी कि वह उसके प्रोमोशन की बात क्यों नहीं करना चाहते हैं।


सुनीता : "सर, मुझे पता है कि आप मेरे काम से बेहद खुश हैं। आप जानते हैं कि इस ऑफिस में कौन मेहनत से आगे बढ़ना जानता है और कौन केवल अपने लिंग का लाभ उठाकर। मैं जानती हूं आपको कई बातें सुनने को मिली होंगी मगर आप ही देखिए क्या मुझे केवल इस बात पर प्रोमोशन कभी नहीं मिल पाएगा कि मैं एक औरत हूं?"


यह सब बातें सुनकर मोहन तिवारी थोड़ा सपकपा सा रह गया। हां उसके कानों तक बात पहुंची थी कि सुनीता एक औरत है, उसको प्रोमोशन देना यानी प्रतिभाएं नष्ट करना। उसको सुनीता से काफी उम्मीदें थीं, वह जानता है कि सुनीता बिना कोई अन्य रास्ता अपनाए यहां तक पहुंची है मगर लोगों की बातों को भी वह नहीं टाल सकता है। बेशक वह खुद लिंग रूढ़िबद्धता में विश्वास नहीं करता मगर अगर उसे समाज में रहना है तो उसे इसी का पालन करना होगा।


सुनीता के कहे शब्द सुनने के बाद मोहन तिवारी एक गहरी सांस लेकर कहता है - "देखो सुनीता, मैं यह नहीं कह रहा हूं कि तुम इस प्रोमोशन के काबिल नहीं हो, लेकिन अगर मैंने तुमको यह प्रोमोशन दे दी तो लोगों के मन में तुम्हारे ही लिए गलत ख्याल पैदा हो जाएंगे और यहीं नहीं मिलने पर तुम सुरक्षित रहोगी। देखो, सब यही मानते हैं कि आदमी को ही तरक्की मिले क्योंकि वह मेहनत करता है, बुद्धिमान है, अगर एक औरत को तरक्की मिलती है तो यह समाज बिल्कुल इसके विपरीत ही सोचेगा। औरत कमज़ोर होती है, यह नौकरी चाकरी करना उसके बस की बात नहीं होती, ऐसा मैं नहीं समाज सोचता है।


सुनीता यह सब सुनकर थोड़ी अचंभित हुई और उसने तुरंत पूछा : "सर समाज अगर यह मानता है तो आप क्यों इसको बढ़ावा दे रहे हैं, आप तो समझदार व्यक्ति हैं।" जिसके उत्तर में मोहन तिवारी केवल एक वाक्य बोलता है जिससे सुनीता के दिमाग में सब कुछ स्पष्ट हो जाता है।


मोहन तिवारी सुनीता के प्रश्न करने पर कहता है : "समझदार मैं हूं सुनीता मगर हूं तो इसी समाज का हिस्सा ही।


सुनीता उतरा हुआ चेहरा लेकर बिना कुछ कहे मोहन तिवारी के केबिन से बाहर निकलती है। सबकी नजरें उसकी ओर हैं, होनी भी चाहिए, इन्हीं लोगों ने तो प्रोमोशन रुकवाया है सुनीता का मगर हमेशा की तरह सुनीता अब चुप नहीं रहेगी।


वह अपना इस्तीफ़ा दे चुकी है। उसके मन की आवाज़ ने जैसे उसे झंझोड़ कर रख दिया हो कि देख सुनीता समाज में आज भी यह रूढ़ि वादी धारणाएं बनी हुई हैं, इसी को तुझे मिटाना है ताकि कल को कोई औरत यह ना सुने : "माफ़ कीजियेगा, औरतें जितनी भी समझदार हो जाएं मगर समाज मर्दों को ही बुद्धिमान मानेगा और यह बात आप भी मान लीजिए।


- अदिति, जीसस एंड मेरी कॉलेज






रविवार, 14 नवंबर 2021

कविता - दिल से दिल मिलाना

दिल से दिल मिलाना

जश्न भी माना लिया
गले पर फूलों से सजा हार भी डाल दिया
पर क्या इन सबने तुम्हें उस रोती मां का दर्द महसूस करा दिया?

तिरंगे से सजा कफन भी उठा लिया
शान और शौकत से सलाम भी ठोक दिया
पर क्या इन सबने तुम्हें उस सैनिक का दर्द महसूस करा दिया?

यह तो सदियों पुरानी चलती आई कहानियों का ज्ञान है
जो बचपन से ही मन में लड़ाई का एक जुनून सा पैदा कर देती है
पर अनुमान है वहां की सच्ची तस्वीर क्या होती है?

बिना कुछ महसूस किए हम भी उसी गीत में सुर से सुर मिलाते रहे, कि देश के लिए शहीद होना गर्व की बात है।
कभी खुद किसी को शहीद होते हुए देखते
तब भी क्या इस गीत में सुर से सुर मिला पाते?

कभी उनके हालातों में जीवन जीकर देखते
कभी अपनों से सालों जुड़ा होकर देखते
तब भी क्या इस गीत में सुर से सुर मिला पाते?

जिस हार और दहशत को खुद महसूस नहीं किया तो फिर किस मुंह से कह दिया - अपने देश के लिए मर मिट जाना गर्व की बात है।

दोस्तों यह बात गर्व की कम
अपने गिरिबान में झांकने की ज्यादा है
यह बात उन शहीदों और उनके परिवारों की ओर
संवेदना और सहनशीलता जताने की ज़्यादा है।
अपने आने वाली पीढ़ी को सच से परिचित कराने की ज़्यादा है।

अब सुर से सुर मिलाने की नहीं
दिल से दिल मिलाने की कामना है।



दीपशिखा उप्रेती
द्वितीय वर्ष, जीसस एंड मेरी कॉलेज

शनिवार, 6 नवंबर 2021

अनुच्छेद - लॉकडाउन ~ सफल या विफल

लॉकडॉउन- सफल या विफल


"थक कर मत बैठ ए मुसाफिर तू आज हारा है तो कल सफल भी होगा , 

क्या हुआ आज अंधेरा है, तो कल एक नया सवेरा भी होगा"


आज हम सब एक महामारी के दौर से गुजर रहे है। आधुनिकता और विकास के इस दौर में मूल्यों कि चमक कही धुँधली पड़ गई है। चीन से आरंभ हुई इस महामारी ने आज ना ही केवल विकास की दर को जकड़ लिया है किंतु मानवता पर भी एक गहरा संकट बन कर सामने आयी है। ऐसे में विकसित देशों के पास जो संसाधन और जो कुशलता उपलब्ध है, वह विकासशील देशों के पास उस मात्रा मै उपलब्ध नही है जिससे स्थिति और बिगड़ती जा रही है। ऐसा ही विकासशील देश हमारा है जहां इस महामारी का आरंभ फरवरी के पहले हफ्ते में देखने को मिला जिसके बाद से इससे संक्रमित होने वाले लोगों की संख्या बड़ती चली गई। इस वैश्विक महामारी की रोकदम के लिए हमारी सरकार ने "लॉकडाउन" का प्रयोग किया। 


मगर प्रश्न ये उठता है कि क्या यह लॉकडॉउन सफल हो पाया। भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में लोकडाउन का प्रयोग और उसकी सफलता पर कई पक्ष सामने आए। मेरे विचार में जब इस लाकडाउन की उपरी चमक को ना देख कर उसकी गहराई में जाकर देखा जाए तो हमे यह पता चलता है कि यह उपाय सक्षम साबित नहीं हो पाया। कुछ आंकड़े व घटनाओं की सहायता के माध्यम से मैं अपने पक्ष को रखना चाहूंगी।


सर्वप्रथम लॉकडाउन की सूचना देने से उसके आह्वान तक केवल 4 घंटे का समय दिया गया, जब की समय कि मांग यह थी की अग्रिम सूचना दी जाए ताकी देशवासी अपने आप को शारीरिक मानसिक व व्यावसायिक रूप से तैयार कर सकें।


आवश्यकता यह थी कि छोटे उद्योग पति अपने उद्योग व उद्योग में काम कर रहे मजदूरों को पूर्ण तरह सूचित कर व उन्हे कुछ संसाधनों के साथ रवाना कर सके ताकी वह भी महामारी के चलते व काम बंद हो जाने की वजह से अपने घर खर्च और परिवार की देखभाल कर सकें।


"चले थे वो इस आस के साथ की चलते चलते घर पहुंच जाएंगे मगर कहां जानते थे कि

सियासी नीतियों में बंध जाएंगे"

"थी आशा उनके मन में कि गांव पोहोंच जाएंगे मगर कहां जानते थे वो की परिवार को 

रोटी के कुछ टुकड़े और कपड़ों के कुछ पुर्जे ही मिल पाएंगे"


आवश्यकता यह थी कि प्रवासी मजदूरों की आवाज़ भी एक पहचान मांग रही थी। क्या लोगों इन हालातों में उन मज़दूरों को दो वक्त की रोटी मिल पाई? 


आवश्यक्ता यह थी कि कोटा में फंसे छात्रों की गुहार भी सुनी जाती। आवश्यकता यह थी कि जो छात्र अपनी प्रवेश परीक्षाओं की अनबन में फंसे है उन्हे सरकार की तरफ से एक मर्गदृष्टी मिलती जिससे वह छात्र मानसिक दबाव में आकर आत्महत्या का माध्यम नही चुनते।


तालाबंदी के मध्य वेतन का भुगतान, व बहू राष्ट्रीय संगठहनों द्वारा कर्मचारियों को निलंबित करना इन विषयों को भी संबोधन की आवश्यकता थी| प्रश्न यह है कि इसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा? 

 

"मुरझाए फुलवारी के लिए वो शीतल पवन थे निराशा में वो आशा की किरण थे

सैकड़ों चिराग जलाए उन्होने

 रहे कार्यरत वह तन मन से"


कोरोना काल में कार्यरत सुदृढ़ व निष्ठापूर्वक "कोरोना वॉरियर" के अगर कार्य स्थलों व सुविधाओं  को हम देखें तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं कि किन स्थितियों और हालतों में कोरोना वॉरियर काम कर रहे हैं।


जमीनी हकीकत देखी जाए तो पता लगता है कि चिकित्सक, पुलिसमैन, बैंक कर्मी व अध्यापक जो इस काल में भी शिक्षा संस्थानों में आकर ऑनलाइन संसाधनों के माध्यम से छात्रों को शिक्षित कर रहे है, क्या उन्हे पूर्ण सुरक्षा मिल रही है? 


क्या सरकार ने चिकित्सक, बैंक कर्मी व पुलिस कर्मियों को उचित संख्या में "PPE" किट पहुंचाई? वेतन व अच्छी सुविधाओं के बिना भी वह अपनी कुशलता के माध्यम से पूर्ण निष्ठा के साथ इस महामारी से संक्रमित लोगो का इलाज कर रहे हैं। शायद ही बहुत कम लोग इस बात से परिचित हैं कि कई चिक्तिसक 5 महीनों से अपने घर नहीं गए। 


आवश्यकता यह हैं की इस जंग में जिन चिकत्सकों ने अपनी जान गंवाई है उनकी शहादत को व्यर्थ ना जाने दिया जाए, ना की सिर्फ थाली पीट कर झूठा सम्मान दिखाया जाए।


सबसे महत्वपूर्ण विषय जो लॉकडाउन से प्रभावित हुआ है वह है देश की "जीडीपी", प्रश्न यह उठता है कि क्या लॉकडॉउन के चलते अपनी नौकरी खोने वाले कर्मचारियों व अपना उद्योग बंद पड़ते देखने वाले छोटे  उद्योग पति, बिना वेतन के बिना काम कर रहे चिकित्सा कर्मी, सफाई कर्मी व शिक्षकों की जिम्मेदारी कौन लेगा। 


 कुप्रबंधन व अदूरदर्शी योजना ही सबसे बड़ा कारण है की लॉकडाउन असफल रहा।


अंत में बस यही कहना चाहती हूं कि कोई राष्ट्रीय सम्पूर्णत: किसी महामारी के लिए तैयार नहीं होता ना ही यह भविष्यवाणी कर सकता है की क्या होने वाला है पर उस समस्या से लड़ने के लिए आवश्यकता है कि एक प्रबंधित, व्यवस्थित व दूरदर्शित योजना का पालन हो और राष्ट्रवासियों का इस लड़ाई में पूर्ण सहयोग या योगदान हो।


धन्यवाद

पुनर्नवा शर्मा

(Psychology (hons) 3rd year) 



शनिवार, 30 अक्टूबर 2021

अनुच्छेद - मिथिला की संस्कृति

*मिथिला की संस्कृति*


भारत के विभिन्न क्षेत्र में भिन्न भिन्न संस्कृति और परंपरा की छटा दिखती है मिथिला की संस्कृति उत्तर भारत की एक विशिष्ट संस्कृति के रुप में जानी जाती है।

मिथिला में हर जाति , धर्म , वर्ग , समुदाय के लोग रहते है, पर सबके बीच सौहार्द और स्नेह का अटूट संबंध है। राजा जनक और उनकी सुपुत्री जानकी इस क्षेत्र की विशिष्टता के प्रतीक हैं यहां के निवासी सरल और शांतिप्रिय हैं। मिथिलांचल क्षेत्र में मुख्यत: मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर, जयनगर, एवं सीतामढ़ी जिले आते हैं मिथिला का मुख्य केंद्र दरभंगा है , जिसे भावी मिथिलांचल की राजधानी भी कहा जाता है। यहां की मुख्य भाषा मैथिली है , जो कर्णप्रिय एवं मधुर है। मछली पान और मखाना यहां की संस्कृति के प्रमुख अंग है यहां शुभ अवसरों पर इनके प्रयोग की सुदीघ पंरपरा रही हैं।
यहां आज भी ग्राम्य संस्कृति की झलक देखी जा सकती है अब भी यहा धोती कुर्ता और साड़ियों को पहनावे के रुप में देखा जा सकता हैं।

यहां धार्मिक सद्भाव का अनुपम रुप लक्षित होता है हर धर्म के लोग मिल कर सभी त्योहारों को मनाते हैं  यह क्षेत्र त्याग, दर्शन , नीति , और सदाचार के लिए प्रसिद्ध रहता है।

यहां की चित्रकला *मिथिला पेंटिंग* के नाम से विश्व विख्यात है यहां के कलाकार केवल देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी सम्मान प्राप्त कर चूके है इसी पावन धरती पर विद्यापति, आयाची मिश्र, नागार्जुन , मंडन मिश्र, चंदा झा एवं दरभंगा महाराज जैसे महापुरुषों ने जन्म लिया, जिनके यश सौरभ से आज भी यहा का वातावरण सुगंधित है । साहित्य , कला एवं संस्कृति की दृष्टि से मिथिला संस्कृति भारत की संस्कृतियों में विशिष्ट स्थान रखती है इस कारण कहा गया है की मिथिला संस्कृति में संपूर्ण भारतीय संस्कृति का प्रतिबिंब झलकता हैं।


सच कहे तो मैथिल, मिथिला और मैथिली अतिविशिष्ट है 
प्रतिभा, मिलनसारिता , नम्रता व आचरण की शुद्धता का संगम है मिथिला।

विद्या , तप , त्याग, दही, मछली, पान और मखाना की अनमोल भूमि है मिथिला । विश्व की समस्त भाषाओं का मिठास की दृष्टि से , भूषण है मैथिली।

" स्वर्ग से सुंदर मिथिला धाम,
मांदान आयाची राजा जनक के गाम,
स्वर्ग से सुंदर मिथिला धाम"


*अंकिता आनंद*
*हिंदी ऑनर्स , द्वितीय वर्ष*

आज पेड़ों की खुशी

आज पेड़ों की खुशी निराली है हर तरफ दिख रही हरियाली है पक्षियों में छाई खुशहाली है क्योंकि बारिश लाई खुशियों की प्याली है  Priya kaushik Hind...