सोमवार, 25 जनवरी 2021

कविता - मैं और तुम

नाम:- सौंदर्या द्विवेदी
बी. ए हिंदी ऑनर्स
जीसस एंड मेरी कॉलेज


तुम और मैं


उस सड़क से आते तुम

सामने से आती मैं

अपने बाल संवारते तुम

खुद पर इतराती मैं 

धूप पढ़ती तुम्हारे चहरे पर

तुम्हें निहारती मैं


तुम्हें देखकर खुश होती मैं

पर मुस्कुराते तुम

देर से निकलती मैं 

पर देर हो जाते तुम

शिक़न आती मेरे माथे पर

और परेशान हो जाते तुम


बेवजह मुस्कुराती मैं 

और तनाव से मुक्त हो जाते तुम

सपने देखती मैं 

मेरे सपनों में आते तुम


कभी तुम 'मैं' होते 

और कभी मैं हो जाती 'तुम'

कविता लिखती मैं

और मेरी कविताओं में आते तुम


घर से निकलती मैं

तो रास्ते में मिल जाते तुम 

नजरे मिलाती मैं

तो बात करने से घबराते तुम


बारिश होती मेरे शहर में

और भींग जाते तुम


कभी तुम 'मैं' होते 

और कभी 'मैं' हो जाती तुम


©सौन्दर्या 🥀


सोमवार, 7 दिसंबर 2020

कविता - पर्दा

Name : Tanu shree rawat
Course and year : Hindi hons 1st year
College : Jesus and Mary college

कविता - पर्दा 

यहां पर्दा है हर रिश्ते में,
ऐसे रिश्तों से डरती हूं।
लुक्का - छिप्पी का खेल हो जैसे,
ऐसे रिश्तों में पलती हूं।
वो हॅंस के के देते हैं कि,
यह कुछ नहीं बस ' यूं हीं ' हैं।
इन ' यूं हीं ' के रिश्तों में ही तो,
तिल - तिल कर मैं मरती हूं।
चुप रहना भी मजबूरी है,
कुछ कहने बस की बात नहीं।
इन रिश्तों के खातिर है तो मैं,
फिर खामोशी सहती हूं।
यहां पर्दा है हर रिश्ते में,
ऐसे रिश्तों से डरती हूं।

रविवार, 29 नवंबर 2020

कविता - महामारी और मानसिक स्वास्थ्य

Name - Saundraya Dwivedi
Course - BA Hindi Hons
Year - second year
College- Jesus and Mary College


ll महामारी और मानसिक स्वास्थ्य ll

ये रास्तों के सन्नाटे 
ये घरो से आती आहटे
कुछ जगहों की पुरानी यादें  
खिड़कियों से झांकती 
कुछ चंचल आंखे
ये बहती हुई पवन
मेरे कानो में आकर कहती है 
ये वक्त भी गुजर जाएगा
ये वक्त भी गुजर जाएगा

लगाया मैने बैर पवन से
पसंद ना आये मुझको बात
भरे भवन में देती है एक झूठी सी आस
फिर भी जाने क्यों जागी है उर में एक आस
पवन कहती है मेरे मन से छोड़ो तुम घबराहट का साथ

कैसे सुनूं मैं बात पवन की ,
मैं महामारी से आहात
पर सुननी जरूरी है आज पवन की ये बात
मन मेरा विचलित रहता है।
बदला है अब मानसिक स्वास्थ्य
तरह - तरह के प्रयोग करूं मैं
पर कैसे जगाऊं आस

©सौन्दर्या द्विवेदी

बुधवार, 25 नवंबर 2020

कविता - पुस्तकें

Name - Saundraya Dwivedi
Course - BA Hindi hons
Year - second year
College - Jesus and Mary College

पुस्तकें 📚

पुस्तकों में होता है 
प्रेम , आशा ,रोमांच और अनुभव
नहीं होता इनमें
द्वेष, ग्लानि और ईर्ष्या 
पुस्तकें मित्र बनाने योग्य है।
पुस्तकें बदल सकती है समाज को 
पुस्तकें रोक सकती है बड़े से बड़े युद्ध को
पुस्तकों में होता है अपनापन
पुस्तकें रखती है किसी के जीवन का अनुभव
एक रोमांचकारी यात्रा व
प्रेमी प्रेमकाओ के प्रेम को
पुस्तकें तोड़ देती है उन जंजीरों को
जो पितृसत्तात्मक समाज की विचारधारा से जन्म लेती है।
महज कुछ पन्नों और स्याही से बने अक्षरो का एकीकरण
हिम्मत रखता है समाज को सुधारने की।
मानव के ज्ञान का सबसे सुंदर निर्माण जो ले जाए समाज को सृजन की ओर वह पुस्तक ही है।

©सौंदर्या 🍁

मंगलवार, 24 नवंबर 2020

कविता - चाय

Name - Saundraya Dwivedi

Year - second year

Course - BA Hindi hons

College - Jesus and Mary College



      चाय ☕


अगर एक चाय मिल जाए


दिल फिर खिल जाए 

बात पुरानी याद आए

वो डायरी के किस्से ,

आंखों के सामने आए

कसम से वो अदरक वाली चाय ,

बड़ी याद आए

उस चाय की गर्माहट ,

और सुबह के कोहरे की आहट

और तुम, आज फिर से बड़े याद आए

हाय ये चाय तो चहरे पर मुस्कुराट लाए

उस सर्दी के हौसले बुलंद हो 

उससे पहले हम चाय पी कर नरम हो जाय

चलो एक चाय हो जाय

चलो एक चाय हो जाए


©सौंदर्या द्विवेदी

रविवार, 15 नवंबर 2020

कविता - कोरोना की दिवाली

Name : Akanksha Dagar
Institution : Ex- DIET Delhi


कविता का नाम- कोरोना की दिवाली...
वह भी क्या दिन थे जब हम अपनों संग थे...
हर त्यौहार सब साथ मिलकर मनाते थे,
दिवाली का होता सबको ऐसा हर्ष उल्लास...
बिछड़े बंधुओं को भी ले आता था पास,
बच्चे-बूढ़े मिलकर घी के दिए जलाते...
एक दूजे को आपस में मिठाइयां खिलाते,
भाग-भाग कर सबको अपने गले लगाया...
आपस में दूरी लाया..जबसे ये कोरोना है आया,
मिठाई बांटे तो अब खाता नहीं यहां कोई...
कोरोना ने हर एक के हृदय में शंका संजोई,
गली मोहल्ले में पटाखे जलाते...
बच्चे हर घर में आतंक फैलाते,
अब ना कहीं शराबा ना ही कोई शोर...
छाया सिर्फ सन्नाटा हर एक ओर,
ना जाने कब आएंगे वे दिन उजियारे...
जब मिलेंगे एक दूसरे से हम सारे।

कविता - बदलता युवा

Name : Akanksha Dagar
institution : Ex- DIET Delhi


कविता का नाम- बदलता युवा...
ना जाने क्या हो गया है?
रखते हैं आस बड़े बुजुर्ग जिनसे आज वही युवा बदल गया है,
जो देता था वक़्त कभी दादा-दादी,नाना-नानी को..
देखो आज वो किसी और दुनिया में खो गया है,
ना पढ़ाई की चिंता, ना समझ ही दुनियादारी की..
ना सम्मान बड़ों का..ना ख़बर बढ़ती बेरोज़गारी की,
बेधड़क-बेखौफ बाइक,स्कूटर,कार दौड़ाते हैं..
दोस्तों को रिझाने के लिए Speed की Vdo भी बनाते हैं,
दुःखी मत हो!आगे लड़कियों की भी बारी है..
सड़कों पर Earphones लगाकर चलना इनका आज भी जारी है,
Late हो रहे हैं,कहकर घर से स्कूल, कॉलेज के लिए निकलते हैं..
थोड़ी दूरी पर वही ठेले पर गपा-गप Momos खाते मिलते हैं,
मम्मी को बड़ी चिंता,बिटिया को लग गई जाने कौन-सी बीमारी..
हर सप्ताह-महीने घट जाता इसका वज़न बारी-बारी,
पापा बड़े खुश बेटा मेरा कितना लायक, स्कूल से सीधे ट्यूशन जाता है..
तेरा लाड़ला एक लड़की को तेरी बहू बता रहा..यह पड़ोसी आकर बताता है,
मज़बूरी कहो या परवाह बात अपनी दादी की हो…
तो बस में दूसरों से Seat दिलाते हैं,
रास्ता 5 मिनट का ही क्यों ना बचा हो...
बुज़ुर्ग खड़ा कांपेगा..फिर भी Seat से नहीं हिलते हैं,
दादी की कहानियां तैयार हैं, मगर सुनने वाले कान बन्द हो गए..
New Generation, New Time कहकर ना जाने वो युवा कहां गए,
क्या करूं ये जनता थक जाती है, लिखना और भी चाहती हूं..
माफ़ करना थोड़ा ज्यादा बोल दिया, आखिर मैं भी इसी में आती हूं।

आज पेड़ों की खुशी

आज पेड़ों की खुशी निराली है हर तरफ दिख रही हरियाली है पक्षियों में छाई खुशहाली है क्योंकि बारिश लाई खुशियों की प्याली है  Priya kaushik Hind...